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रविवार, 12 जुलाई 2015

वो अजब एहसास

हम सोये जागे साथ साथ
पूरी रात, मेरा हाथ
तुम्हारे हाथ को,
कंधे को, पीठ को
कभी कोहनी को...
कहीं न कहीं छूता रहा
वो भी अजब चीज़ थी 'दोस्त'
अगर हाथ लगा तो
नींद आ गयी
और अलग हुआ
तो खुल गयी

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...