पता है मुझको
तुम्हारी पर्त दर पर्त
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे
मेरी बात मानो
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर
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