शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

धड़कते अँधेरे

तेरी यादों के उलझते गहराते अँधेरे 
अँधेरी रातों के कसते तंग होते घेरे

याद हैं ज़ुल्फ़ों के वो घनघोर अँधेरे
वो नींद सुकून की सवेरे से अंधेरे

तेरे लब चमकते हैं ख़ूनी खंजरों की तरह 
कोई चिराग़ न रोशन हो जाये क़ातिल पे मेरे

रहने दे दफ़न मुझको दामन में अपने 
कहीं मिट्टी न हटा देना चेहरे से मेरे

तेरे उरोज़ों के नीचे वो धड़कते अँधेरे
मेरा दिल धड़क रहा है 'दोस्त' दिल से तेरे

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