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रविवार, 19 जुलाई 2015

... ख़ुदा ख़ैर करे

बड़ी दिलकश है उफ़, ये मुस्कान, ख़ुदा ख़ैर करे
कन्धों पे जा ठहरी ज़ुल्फों की ढलान ख़ुदा ख़ैर करे

वो चांदी सी चमकती बालियाँ ज़ुल्फों की जानिब से
घटाओं में जैसे बिजली की चमकार, ख़ुदा ख़ैर करे

गुलाबी रेशम के रंग की रंगत है, चेहरे पे शायद
या रेशम ने है चुराया चेहरे का गुलाब ख़ुदा ख़ैर करे

किस खुशकिस्मत पे इतनी खुश हो, हम भी ज़रा सुने
ग़लत फहमी के होंगे कितने शिकार, ख़ुदा ख़ैर करे

हम तो तस्वीर पर ही डाल चुके हथियार 'दोस्त'
रूबरू हुए तो क्या होगा हाल, ख़ुदा ख़ैर करे



गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कोशिश एक ग़ज़ल की

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश में हाथ रुक गए
मिन्नतों के बाद भी लफ़्ज़ों के अंदाज़ रुक गए 

मांगी मदद अल्लाह से, सिर्फ एक अदद ख़याल की,
ख़याल की तो छोडिये उनके किवाड़ बंद हो गए 

ग़ज़ल बहती रही है और बहती ही रहेगी,
पर आज उसके बहने के सब बहाने रुक गए

हम तो समझे थे कोई ख़ास मुश्किल पेश आयेगी,
पर कलम खामोश रही और स्याही के रंग उड़ गए

मक़ता तो है बहुत दूर इस ग़ज़ल के लिये 'दोस्त',
मतले में ही इस दिमाग़ के कारोबार रुक गए



सोमवार, 13 जुलाई 2015

एक रूमानी ख़याल

याद है मुझको वो परेशान सा चेहरा
वो पसीने के मोती
वो हवा में झूलती जुल्फों की गिरहें
गिरहों से उलझती नाज़ुक सी उंगलियाँ
इधर उधर तकती
हिरन सी निगाहें
जाने क्या ढूंढ रही थीं
के मैं बीच में गया

उसकी निगाह गुज़री मुझ पर से
ऐसा लगा जैसे
रुई का नन्हा सा
क़तरा छू गया
मेरे चेहरे को
हवा के एक हल्के से झोंके ने
एक हसीन खुशबू का एहसास
सांसों में जगाया
आंखें बंद हो गयीं
धरती सूरज चाँद आवाजें
सब के कारोबार रुक गए
पहले सारी काएनात थम गयी
फिर खामोश हो गयी

किसने डाले छींटे पानी के
चेहरे पे मेरे
नींद खुल गयी
या होश गया
सब कुछ ठीक था
सड़कें, लोग, गाड़ियाँ
बादल, हवा, शोर...
बारिश भी शुरू हो गयी थी


मिट्टी गिरने से पहले

पता नहीं कितनी ज़िन्दगी जी गया मैं
तेरी पलकों के साये के बग़ैर 
साये के सहारे के बग़ैर  
सुकूं के बिना
नींद के बग़ैर 
ना-फ़िक्र लम्हों के बिना 
तेरी गर्मी--मोहब्बत,
आगोश की नरमी के बग़ैर

फिर से पोंछ दे मेरे आंसू 
अपने दुपट्टे के कोने से 
भर ले मेरे पसीने के मोती
अपनी नर्म हथेली में 
और आख़िर 
अगर हो सके
तो अपनी सियाह जुल्फों से
अँधेरा कर दे चेहरे पर मेरे
मूँद लूं मैं आंखें
आखिरी बार 

मिट्टी गिरने से पहले

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...