पता नहीं कितनी ज़िन्दगी जी गया मैं
तेरी पलकों के साये के बग़ैर
साये के सहारे के बग़ैर
सुकूं के बिना
नींद के बग़ैर
ना-फ़िक्र लम्हों के बिना
तेरी गर्मी-ए-मोहब्बत,
आगोश की नरमी के बग़ैर
आ फिर से पोंछ दे मेरे आंसू
अपने दुपट्टे के कोने से
अपनी नर्म हथेली में
और आख़िर
अगर हो सके
तो अपनी सियाह जुल्फों से
अँधेरा कर दे चेहरे पर मेरे
मूँद लूं मैं आंखें
आखिरी बार
मिट्टी गिरने से पहले
