satire लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
satire लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 29 जुलाई 2015

राजू को नींद आयी


मैं ये सोच कर एक बाग़ में रुका था
कि कुछ देर रुक कर सुस्ता सकूंगा
बगीचे की
ठंडी हवा थी सुहानी
कुछ देर शायद सो भी सकूंगा
भटकते हुए मुझको दो दिन हो गए थे
खाना न सही, आराम तो मिलेगा
मगर उसने देखा, वो नजदीक आया
'सोना यहाँ मत', ये सुनके घबराया
थी उसकी आवाज़ भारी, फिर भी वो चिल्लाया
वक़्त की नज़ाकत को ज्यों ही मैं समझा
जल्दी से उठ के खड़ा हो गया मैं
खड़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं

रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

शनिवार, 11 जुलाई 2015

नई ज़िन्दगी

अब इस ज़िन्दगी के रंग देखो,
कहीं काई तो कहीं ज़ंग देखो 

कहीं उखड़ चुकी है पपड़ी
कहीं चेहरा बदरंग देखो

चाल की ढ़लती रफ़्तार देखो
टेढ़े मेढ़े पड़ते कदम देखो

हाथों से फिसलती ताक़त देखो 
आँखों की बुझती रोशनी देखो 

बाँहों की कमज़ोरी देखो
जाँघों की मजबूरी देखो 

पुरानी छोड़ो नई बातें सोचो
दिमाग़ की गलियां तंग देखो

चलो छोड़ दो ये सब अब 
हो चुका है इनका काम देखो

बैठो 'दोस्त' और कर लो ऑंखें बंद
और फिर मन का आनंद देखो

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...