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शनिवार, 11 जुलाई 2015

नई ज़िन्दगी

अब इस ज़िन्दगी के रंग देखो,
कहीं काई तो कहीं ज़ंग देखो 

कहीं उखड़ चुकी है पपड़ी
कहीं चेहरा बदरंग देखो

चाल की ढ़लती रफ़्तार देखो
टेढ़े मेढ़े पड़ते कदम देखो

हाथों से फिसलती ताक़त देखो 
आँखों की बुझती रोशनी देखो 

बाँहों की कमज़ोरी देखो
जाँघों की मजबूरी देखो 

पुरानी छोड़ो नई बातें सोचो
दिमाग़ की गलियां तंग देखो

चलो छोड़ दो ये सब अब 
हो चुका है इनका काम देखो

बैठो 'दोस्त' और कर लो ऑंखें बंद
और फिर मन का आनंद देखो

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...