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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

शतरंज के मोहरे

बाबर, एलेग्जेंडर, चंगेज़ 
मुग़ल, जापानी, अंग्रेज़
अकबर, औरंगज़ेब, माओ  
हिमलर, स्टालिन, हिरोहितो
सद्दाम हुसैन, इदी अमीन
तिमूर, अफ़ज़ल, गज़नी

जीतने वाले, हारने वाले
मरने वाले, मारने वाले
एक अँधेरे पिटारे में बंद
एक दूसरे के ऊपर
कूड़े की तरह,
बेतरतीब फेंके हुए
न कोई बात चीत
न कोई हरकत
पर हाथ में तलवार पकड़े
ढ़ाल जकड़े
ताज पहने, पगड़ी बांधे

किसी ने भी ये बात न मानी
ख़त्म हो चुकी थी उनकी कहानी



मंगलवार, 21 जुलाई 2015

अपनापन ग़मों से

मेरे अपनों के ग़म, अब मेरे हो गए लगते हैं 
वो सब लोग अब, और भी अपने से लगते हैं 

दुनिया में सारे दोस्तों के दर्द अब तो 
खुद ही मेरे दिल में बस गए लगते हैं 

उनके ग़मों की काली घटाओं के आगे
मेरे ही ग़म मुझे फीके फीके से लगते हैं 

वहां कोई है अकेला और वो ज़रा बीमार से रहते हैं 
हम इसीलिए उनके ग़मों से बेज़ार रहते हैं

किसी घर में मातम है उनके वापस न आने का
कोई परेशां है, घर में हमेशा ही मेहमान रहते हैं 

मैं हांकता फिरा 'दोस्त' अपने ही दर्दों की डींगें 
औरों की दास्ताँ से जाना, हम तो जन्नत में रहते हैं  



रविवार, 19 जुलाई 2015

अब भी... कभी कभी

मिल जाते हैं अब भी वो लम्हे कभी कभी
जिनके साथ बैठ, दो लम्हे गुज़ारे थे कभी 

ये वक़्त जो सबसे ही मुंह मोड़ लेता है 
इसी वक़्त ने कीमती तोहफे, दिए थे कभी 

दोस्तों की वो बातेंबिलावजह हंसना हंसाना 
बिलावजह ज़हन में  जाती हैं, कभी कभी

काफी कुछ होना है शायद जिंदगी में अभी भी 
पर ये वक़्त ही ठहरा सा लगता है कभी कभी

चाल की तेज़ी, बातों की रफ़्तारख्यालों की रवानी
सब कुछ धीमा सा लगता है, मुझको कभी कभी 

अब तो जो भी ज़िन्दगी में होना बाकी है 'दोस्त'
शायद उसी की कमी महसूस होती है कभी कभी



शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

इंतज़ार - इस पार भी उस पार भी


एक टूटा फूटा सा मकान
उसमें नाई की एक दूकान 
देहलीज पे पेपर पढ़ता नाई नौजवान 
पर ज़रूरी नहीं कि ये पेपर आज का हो 
पेपर की तारीख पर मत जाइये 
उसका काम किसी भी पेपर से चल जायेगा 
वो कोई भी पेपर सामने रख सकता है 
उल्टा या फिर सीधा पकड़ सकता है
शायद वो पढ़ ही नहीं सकता
शायद ये मैं ग़लत कह गया
अजीब सी बात है 
नाई पेपर नहीं पढ़ रहा
लगता है पर है नहीं
असल में वो कोई और ही काम कर रहा है 
एक बेहद ज़रूरी काम
जी हाँ बिना हिले डुले 
बिना कुछ बोले, बतियाए या हाथ हिलाए 
इस तरह तो एक ही काम हो सकता है
इंतज़ार
नौजवान नाई को है इंतज़ार 
किसी लम्बे बालों वाले लड़के का 
या दाढ़ी खुजाते बूढ़े का
उसकी नज़र गली में हर आते जाते पर टिक जाती है 
कभी कभी मिल भी जाती है  
पर फिर फिसल जाती है 
कब आयेगा कोई ऐसा 
जो सामने रुके, उसे देखे 
मुस्कराए और अन्दर आये
बड़ी सी कुर्सी पर बैठ जाये 
अपने दुखड़े रोये उसके सुने 
दाढ़ी बनवाए बाल कटवाए 
फिर खुद को देख खुश हो जाये
हाथ मिलाये
और शीशे के आगे दस रुपये रख जाये 

इंतज़ार बेहद ज़रूरी है
इस नौजवान के लिए 
भले ही वो कुर्सी झाड़ रहा है 
शीशा साफ़ कर रहा है 
पेपर को देख रहा है 
गली को ताक रहा है 
शिकार का इंतज़ार कर रहा है 
पर इंतज़ार भी कहाँ आसान होता है 
इंतज़ार से पेट अकड़ जाता है 
सर में दर्द हो सकता है 
पेपर हाथ से गिर सकता है

नाई की आँखों के सामने जो दुनिया है 
उसमें एक गली है
गली में चहल पहल है 
लोग हैं, गाय हैं, भैंस और कुत्ते भी हैं 
कुछ स्कूटर साइकिल और ठेले भी हैं 
पर किसीने उसकी आँखों के अन्दर अभी तक नहीं झाँका
उसकी आँखों के उस तरफ क्या है
कौन सी और कैसी दुनिया है
ये किसीको खबर नहीं
किसीसे उसकी नज़रें मिल ही नहीं पातीं
उसकी आँखों के उस पार, वहां
एक दूसरी ही दुनिया मिली
मिलती जुलती पर दूसरी
उसमें भी इस दूकान जैसा एक जर्जर एक मकान है
दीवार का सहारा लिए एक कंकाल है
ये औरत नाई की बीवी है 
उसकी आँखें बंद हैं 
स्तन खुला है
पप्पू भूख से गोद में रो रहा है 
बबली का स्कूल जाना बंद हो गया है
चूल्हा ठंढा है
बर्तन ख़ाली हैं
सभी कर रहे हैं,
किसी किसी का इंतज़ार

आँखों के इस पार या उस पार



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...