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रविवार, 19 जुलाई 2015

अब भी... कभी कभी

मिल जाते हैं अब भी वो लम्हे कभी कभी
जिनके साथ बैठ, दो लम्हे गुज़ारे थे कभी 

ये वक़्त जो सबसे ही मुंह मोड़ लेता है 
इसी वक़्त ने कीमती तोहफे, दिए थे कभी 

दोस्तों की वो बातेंबिलावजह हंसना हंसाना 
बिलावजह ज़हन में  जाती हैं, कभी कभी

काफी कुछ होना है शायद जिंदगी में अभी भी 
पर ये वक़्त ही ठहरा सा लगता है कभी कभी

चाल की तेज़ी, बातों की रफ़्तारख्यालों की रवानी
सब कुछ धीमा सा लगता है, मुझको कभी कभी 

अब तो जो भी ज़िन्दगी में होना बाकी है 'दोस्त'
शायद उसी की कमी महसूस होती है कभी कभी



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...