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शनिवार, 16 जनवरी 2016

... तो कितना अच्छा होता

अगर उसे सीने से न लगाया होता
अपना न बनाया होता
तन्हाई से न घबराया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसके चेहरे पे न ये दिल आया होता 
उसकी चाहत ने मुझे न भरमाया होता 
न उसे सर आँखों पर बिठाया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसकी दोस्ती ने दिल को न उलझाया होता 
सोचने की ताक़त को न डुबाया होता
एक के लिए सबको पराया न बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

इस रस्ते पर 
मैंने खुद को, इतना न बढ़ाया होता 
ग़र ज़मीं पर ही अपना घर बनाया होता 
एक बेवफ़ा को न अपना 'दोस्त' बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता







शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

...धीरे धीरे

धीरे धीरे,
बसें, ट्रेनें बढ गईँ
और कम हो गयी जगह
खड़े रहने की,
लटकने की।
धीरे धीरे,

निगल गए झोपड़े
फुटपाथों को
कम हो गयी
चौड़ाई सड़कों की

धीरे धीरे,
बढ़ गई कीमत

मकानों की
वड़ा पाव की
चमक कारों की
इमारतों की
ऊंचाई कचरे के ढेरों की
धीरे धीरे,
गहरी हो गयी खाई,
इनके और उनके बीच की



रविवार, 19 जुलाई 2015

अब भी... कभी कभी

मिल जाते हैं अब भी वो लम्हे कभी कभी
जिनके साथ बैठ, दो लम्हे गुज़ारे थे कभी 

ये वक़्त जो सबसे ही मुंह मोड़ लेता है 
इसी वक़्त ने कीमती तोहफे, दिए थे कभी 

दोस्तों की वो बातेंबिलावजह हंसना हंसाना 
बिलावजह ज़हन में  जाती हैं, कभी कभी

काफी कुछ होना है शायद जिंदगी में अभी भी 
पर ये वक़्त ही ठहरा सा लगता है कभी कभी

चाल की तेज़ी, बातों की रफ़्तारख्यालों की रवानी
सब कुछ धीमा सा लगता है, मुझको कभी कभी 

अब तो जो भी ज़िन्दगी में होना बाकी है 'दोस्त'
शायद उसी की कमी महसूस होती है कभी कभी



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...