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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

...धीरे धीरे

धीरे धीरे,
बसें, ट्रेनें बढ गईँ
और कम हो गयी जगह
खड़े रहने की,
लटकने की।
धीरे धीरे,

निगल गए झोपड़े
फुटपाथों को
कम हो गयी
चौड़ाई सड़कों की

धीरे धीरे,
बढ़ गई कीमत

मकानों की
वड़ा पाव की
चमक कारों की
इमारतों की
ऊंचाई कचरे के ढेरों की
धीरे धीरे,
गहरी हो गयी खाई,
इनके और उनके बीच की



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...