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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

मेरा वक़्त और मैं

कभी ऐसा सोचा
जिनको मिलना था 
वो बिना मिले ही चले गये 
और ख़त लिखा
कि तुमसे मिल कर बड़ा मज़ा आया
उस दिन मौसम कितना ख़ुशगवार था
चौदहवीं के चाँद पे निखार था
तारे भी बिखरे हुए थे
खुशबु के समंदर
हवा पे तैर रहे थे
कैसी अजीब बात है
इतनी सारी बातें लिख डालीं
जो हुई ही नहीं
कोई ऐसा कैसे लिख सकता है 
मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं 
और वो कहता है
हम मिल भी लिए 
पर ज़िक्र चाँद तारों का
खुशबू और हवाओं का
अब 
ख़याल आया ...
शायद मेरा वक़्त और मैं
एक दुसरे से बिछड़ गए हैं
वो धागे टूट गए हैं
जो मुझे मेरे समय से जोड़े रखते हैं 
मुझे जो कुछ कल औरपरसों
करना है / था 
वो सब हो चुका है 
मेरा आने वाला कल बीत चुका है





शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

...धीरे धीरे

धीरे धीरे,
बसें, ट्रेनें बढ गईँ
और कम हो गयी जगह
खड़े रहने की,
लटकने की।
धीरे धीरे,

निगल गए झोपड़े
फुटपाथों को
कम हो गयी
चौड़ाई सड़कों की

धीरे धीरे,
बढ़ गई कीमत

मकानों की
वड़ा पाव की
चमक कारों की
इमारतों की
ऊंचाई कचरे के ढेरों की
धीरे धीरे,
गहरी हो गयी खाई,
इनके और उनके बीच की



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...