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बुधवार, 5 जुलाई 2017

ट्रेन कहानियां

ट्रेन बस छूटने ही वाली थी। रेलवे के कई कर्मचारी अपने-अपने काम में जुटे थे। एक जत्था डिब्बों के नीचे कुछ ठोक बजा के देख रहा था, तो दूसरा ऊपर चढ़ कर नज़र मार रहा था। कुछ लोग प्लेटफार्म पर भी अलग-अलग किस्म का काम कर रहे थे। मसलन, लोगों के टिकट चेक किये जा रहे थे । कुली अपने सर पर भारी सामान ढ़ो रहे थे। ट्रेन के अंदर भी रेल के कई लोग थे। कुछ सफाई देख रहे थे, कुछ यात्रियों को उनकी जगह दिखा रहे थे। बुज़ुर्गों का सामान सही जगह रख रहे थे। यात्रियों के भोजन और चाय पानी की सूची बन रही थी । जी आप शाकाहारी हैं? कटलेट और इडली है। नॉनवेज में ऑमलेट है…
इन सबके अलावा ट्रेन के आसपास, ट्रेन के अंदर और ट्रेन से दूर, बहुत दूर - और भी बहुत कुछ होता है। एक तो वो स्टेशन जहाँ से ट्रेन छूट रही है, दूसरा ट्रेन के अंदर और तीसरा वो स्टेशन जहाँ ट्रेन जा रही है। इन तीनों स्थानों में क्या-क्या घट रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ एक ही इंसान को है, वो है इसका लेखक - जो कि मैं हूँ।

एक

हर ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक यात्रियों को ले कर जाती है। ट्रेनें चलती ही यात्रियों को एक से दूसरे स्थान ले जाने के लिए हैं। जिन्हें भी जहाँ जाना होता है वो उस स्थान का टिकट खरीदते हैं और टिकट में दिए नंबर वाली सीट पर बैठ जाते हैं। स्टेशन पर दो तरह की भीड़ होती है। एक तो वो जिन्होंने कहीं जाना होता है और दूसरे वो जो उन लोगों को छोड़ने आये हैं। जो लोग जा रहे हैं वो के ट्रेन के अंदर चले जाते हैं। बाकी बाहर रहते हैं। ऐसे मौके ज़रा भावुक हो जाते हैं। गार्ड की सीटी और फहराती हुई हरी झंडी से परेशानी और बढ़ जाती है। लोगों की ऑंखें भीग जाती हैं। कई तो खुल के रो लेते हैं। सफ़ेद रुमाल चेहरों का गीलापन सोखते नज़र आते हैं। जो यात्री हैं उनकी मानसिक स्थिति कुछ भिन्न होती है। वो इतने उदास नहीं दिखते। शायद अपनी यात्रा के रोमांचक कारणों से। शायद वो किसी खास व्यावसायिक काम से जा रहे हों। या फिर अपने किसी प्रिय से मिलने। या शायद छुट्टी के लिए ही सही... आख़िर ट्रेन चल पड़ती है। प्लेटफार्म वाले लोग धीरे धीरे पीछे जाने लगते हैं। क़द में छोटे होते जाते हैं। काफी देर तक कुछ सफ़ेद रुमाल दिखाई देते हैं। हिलते हुए हाथ दिखाई देते हैं। फिर सब ओझल... होने लगता है, प्लेटफार्म , फिर स्टेशन, फिर शहर...
ट्रेन और उन सबके बीच का अंतर बढ़ता ही जाता है। धीरे-धीरे लोग हर क्षण बढ़ते हुए अन्तर के बारे में सोचना छोड़ देते हैं।

दो

चलिए अब जो लोग ट्रेन के अंदर बैठे हैं, उन पर नज़र डालते हैं। इन सब लोगों के बीच का अंतर बिलकुल नहीं बदलेगा। ये सब अपनी अपनी कुर्सी पर हैं इस वजह से किन्ही भी दो सीटों के बीच की दूरी बदली नहीं जा सकती। असल में इन सबके पास कोई चारा भी नहीं है, दूर या पास आने-जाने का। इनके पास एक ही विकल्प है, बस बैठे रहो। किसी के पास ये शक्ति नहीं है कि वो किसी को या खुद को हटा सके। अगर ये चाहें तो दुसरे यात्रियों को देखें, और चाहें तो उनसे दोस्ती भी कर लें। असल में कई लोग यही करते हैं। शुरुआत एक मुस्कान देने से हो सकती है, फिर कुछ खाना-पीना, नाम-पता और कभी-कभी जोक्स भी। एक डिब्बे में बंधक जैसे बैठने से कई लोग ऊबने लगते हैं। अगर एक अपने पिछवाड़े को नीचे खिसकाते हुए मुंह फाड़ेगा तो उसके सामने वाला भी, फिर कोई और, और फिर... ट्रेन की लगातार खटखट खटखट से बोरियत का एक जाल सा बिछ जाता है . चेहरे के सारे भाव मिट जाते हैं। आँखें अलसाने लगती हैं। इसके कुछ देर बाद उनके लिए ट्रेन, उसकी खटखट, बाहर के दृश्य, सबके अस्तित्व समाप्त हो जाते हैं।

तीन

दूर कहीं एक ख़ाली प्लेटफार्म पर मंदिर के घंटे जैसी आवाज़ सुनाई दी है। टनटन टनटन टनटन। काले कोट वाला एक आदमी अपने कमरे से बाहर निकला, चारों तरफ नज़र घुमा कर फिर वापस चला गया। छोटी सी एक कैंटीन में खोमचे वाले अंगोछे से मक्खियां हटाने लगे हैं। इन आदमियों को पूरा आराम मिल गया और मक्खियों को भर पेट भोजन। चाय को चौथी बार गरम करने के लिए चढ़ा दिया गया। कुछ नीली वर्दी वाले पटरियों पर उतर आए हैं और हथौड़े से रेल के किसी लोहे के हिस्से को ठोक रहे हैं। स्टेशन मास्टर को बाहर वाले सिग्नल से कड़कड़ करता संदेश आया है। “ट्रेन पास हो रही है साहब”। इसका मतलब पांच मिनट में आ जाएगी। अरे भाई सुपर फ़ास्ट होती तो दो मिनट में निकल भी जाती। पर ये तो रुकने के लिए सिलो (स्लो) हो जाएगी ना। स्टेशन के बाहर कुछ कारें, टैक्सी, ऑटो और साइकिल रिक्शा वगैरा से लोग उतर रहे हैं। ये लोग उन लोगों को लेने आये हैं जो ट्रेन से उतरेंगे। कई लोग तो पहले से ही प्लेटफार्म पर इंतज़ार कर रहे हैं। इनमे से एक, अक्सर प्लेटफार्म किनारे से झुक कर देखता रहा है। अब तो सिग्नल हो गया है। ट्रेन भी दिखाई दे रही है। "आ गयी आ गयी...  कुली, चलो भाई चलो "। जैसे जैसे ट्रेन की दूरी कम हो रही थी, प्लेटफार्म पर लोगों की धड़कनें बढ़ रही थीं। एक युवती मेंहदी वाले हाथों में पूजा की थाली लिए है। उसमें रखा दिया किसीके झुर्रियों वाले हाथों ने जला दिया। वहां कुछ खादी के सफ़ेद कुर्ते भी हैं। उनके हाथों में फूलों के कई मोटे मोटे हार हैं। ट्रेन को देख कर बुज़ुर्ग पति पत्नी आगे बढ़ते हैं। खादी के धक्के से आदमी चौंक जाता है। ट्रेन एक लम्बी तीखी सी आवाज़ करते हुए धीरे धीरे रुक जाती है। फूलों के हार अब एक खादी की मोटी गर्दन में हैं। मिलिट्री की टोपी के आगे पूजा की थाली घूमती है। एक लड़की गले में स्टेथेस्कोप लिए बूढ़े माँ बाप के चरण स्पर्श करती है। गार्ड की सीटी सुनाई देती है। हरी झंडी लहराती है। यहाँ के सभी कलाकार अब प्लेटफार्म खाली कर रहे हैं।

ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी है, अगली कहानी लिखने।



मंगलवार, 27 जून 2017

चाय वाली मुहब्बत

अरे सुनो मुझसे मुहब्बत करोगी ?
सुनो तो सही 
एक मिनट, एक मिनट, बस एक मिनट
मोहब्बत की ही तो बात कर रहा हूँ 
शादी की नहीं 
मोहब्बत में किसी का कुछ नहीं जाता 
शादी में तो तुम्हें पता ही होगा।
ज़िन्दगी दांव पे लगानी पड़ती है 
वो ज़िन्दगी भर का खेल जो है 
प्यार का क्या है 
मुझे कोई पसंद आयी 
किसी को मैं पसंद आया 
"नमस्ते जी क्या आप मेरे साथ एक कप चाय पिएंगी"
"ठीक है पर पहले एक गिलास पानी" 

देखा आपने
बस इतनी सो बात है 
इसमें क्या डरना 
चाय के दौरान कुछ बातें होंगी ही 
शायद फोन नंबरों की अदला बदली हो जाये 
फिर शायद फोन हो भी जाये 

एक कप चाय, एक कॉफी, एक वडा पाव 
कुछ खाली, कुछ थोड़ी भरी लोकल ट्रेन
दोनों के बीच एक बिसलरी की बोतल 
बदला बदला सा पानी का स्वाद 
एक जाना अनजाना स्टेशन 
शहर कम गाँव ज़्यादा 
फिर कुछ दूर पर वो मशहूर ढाबा
खाना बढ़िया था 
बिल भी बुरा नहीं था 
"अरे वेटर वो ऊपर होटल भी है क्या"
"जी साब आप जैसे कई जोड़े आते हैं ना
वो रुक जाते हैं; दो चार घंटे  
कभी कभी सारी रात भी 
उनके लिए है "

निगाहें मिलीं उनमे से एक जोड़ी झुकीं 
एक रुकी रहीं 
एक दबी हलकी सी आवाज़,
अगले हफ्ते आएंगे, आज नहीं 

मैंने कहा था न मुहब्बत कोई टेढ़ी खीर नहीं है 
बल्कि काफी आसान है 

'दोस्त' मुझे तो पीनी है चाय 
आपको नहीं चाहिए तो कोई दिक़्क़त नहीं
हैव ए गुड डे

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

शतरंज के मोहरे

बाबर, एलेग्जेंडर, चंगेज़ 
मुग़ल, जापानी, अंग्रेज़
अकबर, औरंगज़ेब, माओ  
हिमलर, स्टालिन, हिरोहितो
सद्दाम हुसैन, इदी अमीन
तिमूर, अफ़ज़ल, गज़नी

जीतने वाले, हारने वाले
मरने वाले, मारने वाले
एक अँधेरे पिटारे में बंद
एक दूसरे के ऊपर
कूड़े की तरह,
बेतरतीब फेंके हुए
न कोई बात चीत
न कोई हरकत
पर हाथ में तलवार पकड़े
ढ़ाल जकड़े
ताज पहने, पगड़ी बांधे

किसी ने भी ये बात न मानी
ख़त्म हो चुकी थी उनकी कहानी



मंगलवार, 14 जुलाई 2015

गहरी सफ़ेद धुंध

उसने ख़ुद को एक ऐसी दुनिया में पाया, जिसमे कोई गहराई थी, ऊंचाई, कोई दांया ना बायां था. जैसे सारे आयाम ख़तम हो गए थे. सब कुछ एक तरफ़ और एक जैसा ही दिखाई दे रहा था. शायद जैसे एक कागज़ होता है. उसने सोचा ये एक सपना हैआवश्य सपना ही है, वही होगावरना उसकी दुनिया ऐसे कैसे बदल जाएगी? पर, यहाँ से सब कुछ कहाँ चला गया! उसका घरकमरा, मेज़, किताबें…! वो ख़ुद कहाँ है ? कहाँ पहुँच गया है ? ये दुनिया इस बुरी तरह कैसे बदल गयी! चारों ओर कोहरा छाया था. घना सफ़ेद कोहरा. जैसे सर्दी के मौसम में पहाड़ों पे होता है
उसने फैसला कर लिया वो सपना ही देखा रहा है. पर इतना वास्तविक? वो सोच रहा था,
"मैं सोच सकता हूँ, देख  सकता हूँ, फिर भी मेरी नींद क्यों नहीं टूटती. उसने अपना हाथ अपने चेहरे के सामने किया. दायें बाएं घुमाया. हाथ था, दिखाई दे रहा था. अंगूठे को नाच कराया. वो सब कुछ देख रहा था. आँखें खुली थीं... पर इतना कोहरा? ये कहाँ से आया. वो खुद कोहरे की चादर में लिपटा हुआ थाउसने अपना ध्यान और केंद्रित किया, दिमाग पे और ज़ोर दिया. उसके बावज़ूद कुछ बदला.
एक आवाज़ सुनाई दी "तुम्हारी चाय मेज़ पर रखी है." आवाज़ जानी पहचानी थी. अरे हाँ ये तो उसकी पत्नी की आवाज़ है. वो कहाँ है, मेज़ कहाँ है? चाय कहाँ है? वो सब आवाज़ें कहाँ हैं. सड़क से गुज़रता ट्रैफिक, भौकते कुत्ते और, और चिड़ियाँ।  हां चिड़ियाँ कहाँ हैं? कहीं वो चाँद पर तो नहीं पहुँच गया? चारों और फैली सफेदी और सन्नाटा. वो कहीं बहरा तो नहीं हो गया ? पर अभी तो उसने वो आवाज़ सुनी थी, चाय वाली बात, "तुम्हारी चाय मेज़ पर रखी है." वो बोला "हेलो, कोई है? कोई सुन रहा है?" वो अपनी आवाज़ सुन सकता था
"तुम अभी भी सोये पड़े हो, चाय ठंडी हो चुकी होगी", "मैं सब्ज़ी के लिए नीचे जा रही हूँ. बाई के लिए दरवाज़ा खोल देना...  कुछ बोलोगे भी? हाँ या ना?" बीवी गुस्से में लग रही थी.
वो बोला "हां हां, सुन रहा हूं". उसने खुद को बोलते सुना। पर वो कोहरा नहीं गया.

उसने अगली आवाज़ दरवाज़े की घंटी सुनी। उसे उठना ही था।  वो उठा। ओढ़ी हुई सफ़ेद चादर को हटायाजब उसके पैर ज़मीन पर पड़े तो उसे लगा की सब आवाज़ें धीरे धीरे वापस आने लगीं थीं.  ट्रैफिक, चिड़ियाँ, सब। उसने  फ्रिज से एक पानी की ठंडी बोतल निकली और एक घूँट लिया. उसे लगा होश वापस गए हैं. दरवाज़ा खोला तो बाई बेहद नाराज़ थी, "कितना टाइम लेता है तुम. हमको और भी बहुत काम है." और वो पाँव पटकती अंदर चली गयी.

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...