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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारा नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
शायद मुझसे मुख़ातिब भी होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'
तो वो भी अंधेरों का साया होगा

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

दो क़ब्र

याद आती है मुझे,
अपने एक सवाल की 
ज़िन्दगी के सवाल की
उस सवाल के जवाब की
जवाब के इंतज़ार की 
फिर,
कुछ और इंतज़ार की

इंतज़ार तुम्हारे इधर मुड़ने का
उँगलियों में उलझे
दुपट्टे के सुलझने का 
झुकी नज़रों के उठने का 
मुझसे मुख़ातिब होने का 
होठों के खुलने का ...

इस इंतज़ार में,
मैं ज़िन्दगी के कितने बरस
जी कर गया 
तुम्हारे साथ एक उम्र
गुज़ार कर गया 

पर अभी तक हो सका 
तुम्हारा इधर को मुड़ना
दुपट्टे का सुलझना
नज़रों का उठना,
होठों का हिलना
और ज़बां का कुछ कह सकना ...

दूर एक पेड़ के नीचे 
फूलों से ढके 
दो साए से नज़र आते हैं 
गौर से देखो
दो कब्र हैं वो
 
एक मेरे सवाल की 
दूसरीतुम्हारे जवाब की 




शनिवार, 25 जुलाई 2015

धागा, एक ख्याल का

कुछ तो गिला है उनके  चले जाने का 
कुछ ये ग़म कि ये लोग मरते ही नहीं

ज़िन्दगी अगर उदास है उनके बग़ैर 
तो इनकी वजह से मौत भी है शर्मसार,

वो तो फैला देते थे बहारें मोहब्बत की 
इनसे सुलग जातीं हैं चिंगारियां नफरत की 

कितना फर्क़ है 'दोस्त' इस दुनिया के इंसानों में 
वो अगर भगवान् थे, तो ये शामिल हैं हैवानों में

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

ये ज़िन्दगी

बेतहाशा भागती ज़ार ज़ार ज़िन्दगी 
ये बेअक़्ल, बे-लगाम ज़िन्दगी

समझ सका ना कभी मैं जिसको 
ऐसी बेमक़सद बेअक़ल ज़िन्दगी 

क्या भला करेगी ये मेरा कभी
है ख़ुद जो बेकार बेकाम ज़िन्दगी

क्या दे सकती थी परेशानियों के सिवा
ये मेरी बेहया बेआराम ज़िन्दगी 

मेरी मौत की वजह एक ही है 'दोस्त' 
मेरी ये बेग़ैरत बेईमान ज़िन्दगी



शर्त दोस्ती की

आजकल मन ज़रा बोझिल सा है 
देख कर दुनिया को
ख़ुद कोख़ुद की शकल को 
अपने घर को 
दर--दीवार को 
दीवार की बदरंगी को 
बदरंगी दीवार की दरारों को 
दोस्तों के मिज़ाज को 
अपनों के तेवर को 

अब फैसला हो ही जाना चाहिए 
देर से नुकसान बढ़ सकता है 
बर्दाश्त की हद्द से गुज़र सकता है 
असली मुद्दा है 'क्यों'  
आख़िर क्यों बर्दाश्त करे कोई 
अगर तुमको अपनी बातों में मायेने नज़र आते हैं 
और मेरा हर लफ्ज़ मज़ाक 
तो हम दोस्त नहीं दुश्मन हैं
अगर तुम्हें लगता है कि तुम जेल में हो
तो मैं भी यहाँ मर रहा हूँ घुट घुट कर  
जिस तरह तुम्हें फ़ख्र है अपनी अक़्ल पर
वैसे ही मुझे भी घमंड है अपनी सोच पर
मैं अपनी बेईज्ज़ती बर्दाश्त कर लूं
पर अपने ख़्यालों के बारे में कुछ नहीं सुनूंगा
बिलकुल तुम्हारी तरह
मेरे ख़्याल मुझे भी प्यारे हैं 
दुनिया में सबसे न्यारे हैं 
ख़ूबसूरत हैं 
अक़्ल से भरे पूरे हैं 
इनमें कोई कमी नहीं 
किसी को हक़ नहीं इनको ग़लत कहने का 
इनकी बेईज्ज़ती करने का 
ये मेरे दिमाग़ की उपज हैं 
ये पाक हैं 
ये मेरे भगवान हैं 

शायद हमारी दोस्ती की सबसे ज़रूरी शर्त होगी 
इज्ज़त मेरे विचारों की 
मेरे ख़्यालों की 
तुम मुझे कुछ भी कह लो 
मेरी शक्ल का  
मेरे कपड़ों का मज़ाक उड़ा लो 
पर अगर तुमने कहा
कि मैंने जो कहा, वो ग़लत गलत था 
तो 'दोस्तवक़्त बर्बाद मत करो 
मैं इस तरफ मुड़ता हूँ
तुम उस तरफ मुड़ लो

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...