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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

दो क़ब्र

याद आती है मुझे,
अपने एक सवाल की 
ज़िन्दगी के सवाल की
उस सवाल के जवाब की
जवाब के इंतज़ार की 
फिर,
कुछ और इंतज़ार की

इंतज़ार तुम्हारे इधर मुड़ने का
उँगलियों में उलझे
दुपट्टे के सुलझने का 
झुकी नज़रों के उठने का 
मुझसे मुख़ातिब होने का 
होठों के खुलने का ...

इस इंतज़ार में,
मैं ज़िन्दगी के कितने बरस
जी कर गया 
तुम्हारे साथ एक उम्र
गुज़ार कर गया 

पर अभी तक हो सका 
तुम्हारा इधर को मुड़ना
दुपट्टे का सुलझना
नज़रों का उठना,
होठों का हिलना
और ज़बां का कुछ कह सकना ...

दूर एक पेड़ के नीचे 
फूलों से ढके 
दो साए से नज़र आते हैं 
गौर से देखो
दो कब्र हैं वो
 
एक मेरे सवाल की 
दूसरीतुम्हारे जवाब की 




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...