बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बुवाई और सिंचाई एक ओर
बच्चों का शोर दूसरी ओर
बच्चों का शोर दूसरी ओर
दूर से माँ की पुकार गुहार
लल्ला बाबूजी आएंगे अबकी बार
रामू, लल्ली, घनस्याम, बनवारी, राधा
हर बच्चा अपनी झोंपड़ी की तरफ भागा
धुंए का एक बादल हर छप्पर पर बैठा था
भोजन का समय हो चुका था
रोटी दाल और चावल की सुगंध से वातावरण भर गया था
उधर सूरज लगातार पश्चिम की ओर झुक रहा था
और पेड़ों की फुनगियों से नीचे सरकने लगा था
चिड़ियों के झुण्ड किरणों का ये इशारा समझ गए थे
सब अपने-अपने घोसलों में लौट रहे थे
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे
भोजन का समय जो हो गया था
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था
