darkness लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
darkness लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 22 मार्च 2017

अंधेरों का पहाड़

दूर वो जो ऊंचा सा अँधेरा दिखाई दे रहा है ना
वो वहां उस तरफ, काले से पहाड़ जैसा
उसे अंधेरों का पहाड़ कहते हैं
हाँ वही, अँधेरे का पहाड़
नहीं नहीं वो नहीं, उसके उस पार,
उधर उस तरफ ओहो दूसरी तरफ
जी हाँ उधर ही, वहीं कहीं
मेरी रोशनी छुपी बैठी है
क्यों आप नहीं देख पा रहे उसे ?
वो, अँधेरे के ठीक बीचो बीच?
ध्यान लगाइये
मैं तो आसानी से देख सकता हूँ
अँधेरा है तो क्या हुआ
देखना तो रोशनी को है ना
अँधेरा अपनी जगह, रोशनी अपनी जगह
हाँ, मैं मनाता हूँ कि अगर रोशनी हो
तो अँधेरा नहीं हो सकता
दोनों एक साथ नहीं रह सकते
पर अब ऐसा है, तो क्या करें
आपकी बात 
ठीक है ...
मैं मानता हूँ
आपको रोशनी नहीं दिखाई दे रही
और मुझे?
वैसे, मुझे भी इतनी ठीक से...
पर वो है ज़रूर
वहीं अँधेरे के उस पर
नहीं नहीं पहाड़ के उस पार
मुझे... मुझे जाना है वहां
उसके बग़ैर मैं...
हां मानता हूँ काफ़ी मुश्किल है 
पर देखो, एक बार चल पड़ा तो
रास्ता भी मिल ही जायेगा
जहाँ चाह वहां राह
सुना होगा 
शायद उस अँधेरे पहाड़ के रास्तों पर रोशनी हो
या शायद, न भी हो
इसलिए अँधेरे के अंदर सीधे चलना ही मुनासिब होगा
जब कुछ दिखाई न दे, तो सीधे चलना चाहिए

ऐसा कहते हैं
पता नहीं रास्ते में क्या मिल जाये
क्या टकरा जाये
कांटे पत्थर खाई
सांप बिच्छू या कोई बड़ा जानवर
कुछ भी मिल सकता है
तो क्या ये सब सीधे रास्तों पर नहीं मिलेंगे 
हाँ, अगर सोचो तो... पर
मेरे जैसे इंसान भी मिल सकते हैं
क्या दुनिया में 
सिर्फ मुझे ही रोशनी की तलाश है?
और आपको...  आपको नहीं है
क्या उस पार के लोगों को
इस पार की रोशनी की तलाश नहीं होगी?
हो भी सकती है
ना?



सोमवार, 20 जुलाई 2015

प्रकाश दर्शन

क्या सच है क्या झूठ
क्या प्रकाश की ओर बढ़ना ही सत्य है
क्या अंधकार में रहना सर्वथा मिथ्या है
क्या अंधकार ही मिथ्या है
क्या अंधकार में जीवन बिताना मूर्खता है
क्या अंधकार और प्रकाश के बीच एक समझौता नहीं हो सकता
इनके बीच कोई रास्ता नहीं निकल सकता
जहाँ से मैं कहीं भी जा सकूँ

कभी कभी मुझे एक ओर तीव्र प्रकाश दिखाई देता है
जो मुझे अपनी ओर खींचता है
उस ओर बढ़ता हूँ
तो बीच में एक पारदर्शी दीवार से टकरा जाता हूँ
वो दीवार मुझे रोक देती है
आगे नहीं जाने देती
शायद वो चाहती है कि मुझे कहीं प्रकाश की आदत न पड़ जाये
ऐसा न हो कि मैं प्रकाश के बिना रह न सकूँ
जबकि अँधेरा ऐसा नहीं सोचता
वो मुझे चारों ओर से घेरे रखता है
एक सुरक्षा कवच की तरह
अँधेरे में मैं कहीं भी जा सकता हूँ
वहां कोई दीवार नहीं होती
फिर भी जाने क्यों
मेरे अंदर ही कोई शक्ति मुझे
अँधेरे से प्रकाश की ओर जाने के लिए प्रेरित करती रहती है
इन दो शक्तियों के बीच मुझे वो रेखा ढूढनी होगी
जहाँ दोनों का मेल हो एक ओर प्रकाश हो
और दूसरी ओर अँधेरा हो
वहां मैं शांति से ऑंखें बंद करके बैठ सकूँ

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मैं और मेरा अँधेरा

क्या दर्द एक अँधेरा है
या अँधेरा एक दर्द है
या शायद ये दर्द का अँधेरा है
पर ये कालिख पुते दिन रात
सवेरा नहीं होने देते
ज़िन्दगी में मेरी

ये कहाँ के बादल हैं 
जिन्होंने ढक दिया
तुम्हारा चाँद सा चेहरा 
वो सूरज सी मुस्कान 

अब तो तुम हो
और  तुम्हारा नाम
बचा है तो सिर्फ तुम्हारा ग़म
गुज़र जाएगी बाक़ी भी
इसी ग़म के सहारे 'दोस्त'

पर उफ़ ये अधेरा...

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...