खामोश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खामोश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

ख़ाली पन्ने

ख़ाली  पन्नों की तरह दिन पलटते जा रहे हैं,
ख़बर नहीं के ये, रहे हैं या जा रहे हैं।

किसी रोज़ के चेहरे पर कोई नयी कहानी नहीं,
बस वही एक खामोश दास्ताँ दोहराए जा रहे हैं।

सुबह का उजाला करता है सबके दरवाज़े रोशन,
हमारी जिंदगी में तो बस तारीखें बदले जा रहे हैं।

चंद चाहनेवाले, कुछ यार-दोस्त और ढेर से ख़ैरख़्वाह,
पहुँच गए बहुत ऊंचे, अब पहुँच के बाहर होते जा रहे हैं।

समझ नहीं आया कहाँ भूल हुई, कैसे अटक गई गाड़ी,
दुनिया की भागमभाग को हम खिड़की से देखे जा रहे हैं। 

कहा वाइज़ ने अच्छे दिन तो कब के आ चुके 'दोस्त',
पर उन्हीं के इंतज़ार में हम बरसों गुज़ारे जा रहे हैं।

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

इश्क, एक ख़याल से

मैंने शायद तुम्हें पहले भी कभी सोचा है 
अजनबी तो हो
मगर इसी दिल में कहीं रहती हो
अनकही भी हो
पर मेरी ग़ज़ल लगती हो
वाकिफ हूँ मैं तेरी महकती घनी जुल्फों से 
जिनकी खुशबू मेरी साँसों में घुली हैं
जिनके अँधेरों से मेरी रातें बनी हैं
देख कर तुमको
किसी मूरत की याद आती है
एक ख्याल की जिंदा
सूरत नज़र आती है

याद है मुझे आज भी
उस दिन का वो अँधेरा पहर 
हाथों की मज़बूत पकड़
और उनके छूटने का डर

ये तो होना ही था
अब न तो तुम हो
न है तुम्हारा साथ
मेरा ख़ाली हाथ ढूँढ़ता है
वो  नर्म हाथ ...

शायद इश्क था मुझे
इस ख़याल से

मेरे ख़याल से

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...