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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

इश्क, एक ख़याल से

मैंने शायद तुम्हें पहले भी कभी सोचा है 
अजनबी तो हो
मगर इसी दिल में कहीं रहती हो
अनकही भी हो
पर मेरी ग़ज़ल लगती हो
वाकिफ हूँ मैं तेरी महकती घनी जुल्फों से 
जिनकी खुशबू मेरी साँसों में घुली हैं
जिनके अँधेरों से मेरी रातें बनी हैं
देख कर तुमको
किसी मूरत की याद आती है
एक ख्याल की जिंदा
सूरत नज़र आती है

याद है मुझे आज भी
उस दिन का वो अँधेरा पहर 
हाथों की मज़बूत पकड़
और उनके छूटने का डर

ये तो होना ही था
अब न तो तुम हो
न है तुम्हारा साथ
मेरा ख़ाली हाथ ढूँढ़ता है
वो  नर्म हाथ ...

शायद इश्क था मुझे
इस ख़याल से

मेरे ख़याल से

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...