गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

शिकायत गज़ल की

क्या इस ग़ज़ल के लबों पर मुस्कान है ?

या वो परेशान है ?

अरे क्यों बिलावजह उठा दिया 

अभी तो मैं सोई थी 

ख़ूबसूरत सपनों में खोई थी 

आँखों में नींद की ख़ुमारी थी 

तैयार होने की बारी थी...  

जी आप से तो कोई  तक़ल्लुफ़ नहीं  

मैं जैसी भी हूँ सोई-जागी, ठीक है 

पर आप तो मुझे दूसरों के सामने पेश करेंगे 

आप मुझे दूसरों के लिए ही बनाते हैं ना 

यहाँ मुझे  दिक़्क़त है

आप तो ऐसे शायर हैं  

कि सर झुकाया, क़लम उठाई  

और बहने लगी ग़ज़ल क़ाग़ज़ पर 

अपनी मर्ज़ी से या ज़बरदस्ती से ... 

ग़र मुझे कुछ और वक़्त मिला होता

तो मैं ज़्यादा अक़लमंद लग सकती थी 

कुछ और ख़ूबसूरत लग सकती थी 

होठों पर लाली लगा सकती थी 

आंखों में काजल डाल सकती थी

गुलाबी और सुनहरे कपड़े वग़ैरह

आख़िर... लोग मेरी तारीफ़ करके 

आप ही की तारीफ़ करते हैं ना  

 



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