गए ज़माने शांति के
ठंडक के
ठंडे दिमाग़ के
सलीक़े के, तरीक़े के
बात चीत के
समझने समझाने के
सुलझाने के
उसकी उसे लौटाने के
अपना आधा भी,
उसे दे आने के
क्यों लगते हैं सब इतने नाराज़ ?
कोई भी खुश नहीं
जैसे कभी ख़ुशी देखी ही नहीं
मानो दुश्मनी कर ली हो हंसी से
मुस्कान से मुंह फेर लिया हो
कितनी ज़मीनों का ख़ून
सूख नहीं पाया
सूख ही नहीं पाता
बहाने जो हैं उनके पास
ताज़ा ख़ून बहाने के
अब तो प्यार जैसी चीज़ भी
जान लेकर हासिल की जाती है
चाकू के दिखा कर
चोट पंहुचा कर
कपड़े फाड़ कर
किसी को किसी का ख़ौफ़ नहीं
मरने का, मारने का
ज़िन्दगी तबाह हो जाने का
राम जाने क्या वजह हैं उनकी
क्या बहाने हैं उनके
सुना है लाखों बरस बाद
ये सूरज आज से कहीं ज़्यादा गरम होगा
हमारे दिमाग़ की तरह
गरम होता ही जायेगा
हमारे और नज़दीक आयेगा
आता ही जायेगा
हमें डरायेगा तड़पायेगा
झुलसायेगा
और फिर शायद …
हमें निगल जायेगा
सूरज भी देख रहा है हमको
सीख रहा है चुपचाप हमसे
हमारी ज़िन्दगी से
उस बेचारे को क्या पता
ग़लत और सही का
वो हमारी तरह ज़िंदा नहीं
वो हमारी तरह सोचता नहीं
फिर भी ये अच्छा तरीक़ा होगा
ग़लतियाँ सुधारने का
हर ग़लत को आग से राख बनाने का
हां, सही को भी साथ जल जाने का
शायद सूरज को इतना तो पता है
कि सब कुछ ख़त्म करके ही
ग़लत भी ख़त्म हो पायेगा
एक नई दुनिया तभी जन्मेगी
जब पुरानी मरेगी
मुझे मंज़ूर है वो आख़िरी आग
धू धू करती
आग की वो लपटें
मुझे ढूँढतीं
मुझसे लिपटतीं
मेरा सहारा लेतीं
ग़लत के साथ सही को भी भस्म करतीं
कौन किसका सहारा बनेगा
कौन किसकी ज़िन्दगी बदलेगा
ये तो वक़्त आने पर
वक़्त ही बताएगा

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