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शनिवार, 21 दिसंबर 2024

एक ख्वाहिश ऐसी

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी,
ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी
कि पूछो मत कैसी कैसी
बेहद अजीब हों जैसी
बिल्कुल नामुमकिन हों, वैसी

कभी कभी तो मुझे लगता है 
मैं कहां से ढूँढूँ ख़्वाहिश ऐसी
मैंने कहाँ से सीखा
ऐसी मांगो दूसरी ढूंढो
ये रहने दो, ये कुछ खास नहीं
अरे ये तो आसान है
इसकी कोई क़ीमत नहीं  
आसान ख़्वाहिश की ख़्वाहिश भी, 
ख़्वाहिश कैसी

तो मैंने सोचा 
कि
सोचा जाये
किसी ऐसी मुश्किल ख़्वाहिश के बारे में 
ऐसी मुश्किल ऐसी मुश्किल, जिसे किसी ने 
कभी न सुलझाया हो, वैसी 
ऐसी मुश्किल जिसका ख़्याल ही किसी को न आया हो  
काम मुश्किल था 
इसीलिए मैंने सोचने का सिलसिला शुरू कर दिया
ऐसी हर एक चीज़, जो हो एक ग़ज़ब की मुश्किल 
जो हो इतनी मुश्क़िल, इतनी मुश्क़िल
कि उसकी ख़्वाहिश से ही दम घुट जाये
 
बरसों की मेहनत के बाद आख़िर 
मुझे मिल ही गया वो ख़्याल 
कि ऐसी चीज़ की ख़्वाहिश करो
जो दिखाई दे
पर मिल न सके
सामने हो पर
उसे छुआ ना जा सके

कहानी कुछ चाँद सितारों जैसी
ये दिखाई देते हैं, बस 
बस इतना ही
उसके आगे कुछ नहीं 
देखिए और खुश रहिये

चलिए 'दोस्त' मुश्किल थोड़ी आसान कर देते हैं 
हज़ारों लफ्ज़ मिटा देते हैं
जी मेरा मतलब है ये लफ्ज़ 'हज़ारों' हटा देते हैं
ग़ालिब बड़े शायर थे मैं उनका
एक हज़ारवां हिस्सा भी नहीं हूँ

"एक ख़्वाहिश ऐसी कि उस एक से ही दम निकले"




शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

ये भी...?

हेलो, कैसे हो?
ठीक हूँ
आज क्या इरादा है?

आज? आज कुछ अलग करते हैं
अलग? मतलब?
मतलब अलग जैसे कि ...
हाँ हाँ जैसे कि क्या ?
चलो आज कुछ सोचते हैं
सोचें? मगर ...
अरे ओरिजिनल आईडिया, बिल्कुल क्रियेटिव
बैठ जायें?
हाँ ठीक है
खडे खड़े तो मुश्किल हो जाएगा

काफी वक्त लग सकता है
अखिर सोचना है कोई मज़ाक तो नहीं
पहली बार भी है ना, सोचना 
ठीक है आओ बैठो
अच्छा तो बताओ क्या सोचें?
क्या मतलब?
मतलब ये कि किस चीज़ के बारे में सोचें?
ओहो! तो ये भी सोचना पड़ेगा ?



फिल्मी फिलोसोफी

कई वर्ष पहले इस कविता की पहली दो पंक्तियाँ मेरे एक मित्र, स्वर्गीय विभूती नाथ झा ने मज़ाक-मज़ाक में कह दीं थीं। इन्हें सुन कर सबको बड़ा मज़ा आया। मैंने सोचा कि ये लाईने भले ही हलकी फुल्की लगती हैं पर इनके अन्दर एक अलग तरह का वज़न है। इसलिए मैंने इन लाइनों को आगे बढ़ाने की सोची... तो ये रही मेरी कोशिश:

नहीं चाहिऐ डिज़ोल्व कभी भी मुझे,
ए मौत जब भी आना, कट से ही आना।

शूटिंग, एडिटिंग, हाई बैंड, बीटा,
किसी को लो बैंड से नीचे ना गिराना।

अगर मुक्कदर में फेड आउट ही लिखा हो,
ओटो-एडिट से है मुश्किल, पता लगाना।

मीटर की पीक पर हमेशा नज़र रहे,
नामुमकिन है डिस्टौरशन को ठीक कर पाना।

हम जानते हैं कितना जानते हैं हम, फिर भी,
नशा देता है टाइटल्स में अपना नाम आना ।

दुनिया में इन-आउट मार्क सभी के हैं 'दोस्त',
मेरी शॉर्ट फिल्म को ज़्यादा लंबी मत बनाना।


डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...