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मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा ?
और कोई दिखाई क्यूँ नहीं देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
और बाकी दुनिया? वो कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग... 
लाखों करोड़ों
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं... वो भी नहीं 
ये... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसी का कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़... क्या मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
...ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन...
दोस्त या कोई और 
पर अँधेरे के उस टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो या ना हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे बिल्कुल पीछे आ गया 
मैं ज़रा डरा, हिचकिचाया
तो वो भी वहीं रुक ही गया 

फिर... कुछ बेहद अविस्वशनीय हो गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं सन्न रह गया 
पीछे मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में लबालब भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना असम्भव होगा
... ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया



बुधवार, 19 अप्रैल 2017

आसान मुश्किलें

मुश्किलेँ ?
मुश्किलें हैं तो क्या हुआ
नामुमकिन तो नहीं हैं
जब से मैंने इनको तव्वजोह देना बंद कर दिया
ये मेरे आगे पीछे घूमने लगीं
मैंने फिर भी हवा न दी
अरे भाई जब इंसान का काम आसानी से चल जाता है
तो मुश्किलों की क्या ज़रुरत है
तो जनाब मेरे इन नए तेवरों से
मुश्किलों की शक्ल उड़ी उड़ी लगने लगी है
घबरा सी गयी लगती हैं
ख़ैर बहुत परेशान कर लिया इन्होनें मुझे
इन्हें अपने पर कुछ ज़्यादा ही घमंड हो गया था
और घमंड तो एक दिन टूटना ही था
ये हमेशा ही टूटता है
सही वक़्त आ जाये तो किसी भी मुश्किल का घमंड
आसानी से टूट जाता है


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शोर और शांति

कितना शोर है चारों तरफ़ 
कितनी हलचल 
सड़क दिखती है मेरी खिड़की से 
कारें टेम्पो ऑटो स्कूटरों की आवाज़ें 
और उनके हॉर्न 
बीच में सड़क पार करने की कोशिश में 
बच्चों के हाथ पकड़े औरतें, कुछ बूढ़े
दुम दबाये बिदकते कुत्ते 
कितनी परेशानियों में है हर कोई 
कोई यहाँ से वहां जाना चाहता है 
तो किसीको उस तरफ से, इधर आना है 
कई इस शोर में फोन को कान पर दबाये हैं 
भागे जा रहे हैं 
कुछ कहने की कोशिश में 
या कुछ सुनने की ख्वाहिश में

कुछ देर में मन भारी हो गया 
खिड़की के बाहर अगर इतनी ऊर्जा है 
तो पूरे शहर में क्या होगा 
और दुनिया में... ?
मैं अंदर गया 
खिड़की भी बंद कर दी 
आवाज़ें ज़रूर काम हो गयीं 
पर मन पर जम चुका था 
उस छोटी सी सड़क के 
परशानियों का बोझ

मुझे समुद्र की याद गयी 
समुद्र मुझे बेहद पसंद है 
उसकी लहरों में कितनी ताक़त होती है 
कितनी दृढ़ता 
वो कभी रुकती नहीं 
एक लहर शोर मचाती किनारे से टकराती है 
तो उसके पीछे दूसरी 
फिर एक और, फिर और एक
एक एक कर के  
अनगिनत लहरें एक सा शोर मचातीं
अपने-अपने किनारे पा जाती हैं
पता नहीं कितनी लहरें हैं समुद्र में 
और कहाँ छुपी बैठी हैं 
पर आपको अंदर की बात बताऊँ  
लहरों को देखने से मेरा मन शांत हो जाता है 
क्योंकि इनका शोर और इनकी उर्जा अलग है 
मेरी आँखें बंद होने लगीं थीं
पलकें भारी होने लगीं 
धीरे धीरे मन लहरों के नीचे चला गया 
नीचे झाँका तो अथाह गहराई नज़र आयी 
अब लहरें ऊपर से जा रही थीं 
उनका शोर काम हो गया था 
लगा जैसे यहाँ भी खिड़की बंद हो गयी हो 
नीचे की दुनिया अलग थी 
बिलकुल अलग 
मैं और नीचे गया 
थोड़ा और नीचे 
और भी थोड़ा 
लगने लगा जैसे स्वर्ग गया हो 
वहाँ सब कुछ बिलकुल धीमे चल रहा था 
एक नन्हा सा शंख रेंग रहा था 
पता नहीं उसे कहीं जाना भी था या नहीं 
कुछ छोटी बड़ी मछलियां बिना ध्येय के रेंग रही थीं 
इधर उधर 
जैसे शाम को टहलने निकली हों 
किसीको कोई जल्दी नहीं 
किसीसे मिलना नहीं 
कहीं जाना नहीं
कुछ पूछना नहीं 
कुछ कहना नहीं 
कोई समस्या नहीं 
ऊपर की दुनिया में क्या हो रहा है 
वहां कितना शोर है 
कितनी परेशानियां हैं 
किसी को कुछ पता नहीं


शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...