शायद वक़्त आ गया है
बग़ावत का
उनसे बराबरी का
बराबरी के जवाब का
वैसे ही सख़्त जवाब का
कभी कभी सोचता हूँ
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर
उनसे लड़ना
उनकी ज़बान में
उनके पैतरों से
उन्हें जवाब देना
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ
उनको सबको
भर चुका है मेरा प्याला
दुनिया की कड़वी बातों से
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया
मुरव्वतों का
मीठी ज़बान का
कही अनकही करने का
देखी अनदेखी करने का
सुनी अनसुनी करने का
अब तो जनाब यूँ है कि
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा
