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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शोर और शांति

कितना शोर है चारों तरफ़ 
कितनी हलचल 
सड़क दिखती है मेरी खिड़की से 
कारें टेम्पो ऑटो स्कूटरों की आवाज़ें 
और उनके हॉर्न 
बीच में सड़क पार करने की कोशिश में 
बच्चों के हाथ पकड़े औरतें, कुछ बूढ़े
दुम दबाये बिदकते कुत्ते 
कितनी परेशानियों में है हर कोई 
कोई यहाँ से वहां जाना चाहता है 
तो किसीको उस तरफ से, इधर आना है 
कई इस शोर में फोन को कान पर दबाये हैं 
भागे जा रहे हैं 
कुछ कहने की कोशिश में 
या कुछ सुनने की ख्वाहिश में

कुछ देर में मन भारी हो गया 
खिड़की के बाहर अगर इतनी ऊर्जा है 
तो पूरे शहर में क्या होगा 
और दुनिया में... ?
मैं अंदर गया 
खिड़की भी बंद कर दी 
आवाज़ें ज़रूर काम हो गयीं 
पर मन पर जम चुका था 
उस छोटी सी सड़क के 
परशानियों का बोझ

मुझे समुद्र की याद गयी 
समुद्र मुझे बेहद पसंद है 
उसकी लहरों में कितनी ताक़त होती है 
कितनी दृढ़ता 
वो कभी रुकती नहीं 
एक लहर शोर मचाती किनारे से टकराती है 
तो उसके पीछे दूसरी 
फिर एक और, फिर और एक
एक एक कर के  
अनगिनत लहरें एक सा शोर मचातीं
अपने-अपने किनारे पा जाती हैं
पता नहीं कितनी लहरें हैं समुद्र में 
और कहाँ छुपी बैठी हैं 
पर आपको अंदर की बात बताऊँ  
लहरों को देखने से मेरा मन शांत हो जाता है 
क्योंकि इनका शोर और इनकी उर्जा अलग है 
मेरी आँखें बंद होने लगीं थीं
पलकें भारी होने लगीं 
धीरे धीरे मन लहरों के नीचे चला गया 
नीचे झाँका तो अथाह गहराई नज़र आयी 
अब लहरें ऊपर से जा रही थीं 
उनका शोर काम हो गया था 
लगा जैसे यहाँ भी खिड़की बंद हो गयी हो 
नीचे की दुनिया अलग थी 
बिलकुल अलग 
मैं और नीचे गया 
थोड़ा और नीचे 
और भी थोड़ा 
लगने लगा जैसे स्वर्ग गया हो 
वहाँ सब कुछ बिलकुल धीमे चल रहा था 
एक नन्हा सा शंख रेंग रहा था 
पता नहीं उसे कहीं जाना भी था या नहीं 
कुछ छोटी बड़ी मछलियां बिना ध्येय के रेंग रही थीं 
इधर उधर 
जैसे शाम को टहलने निकली हों 
किसीको कोई जल्दी नहीं 
किसीसे मिलना नहीं 
कहीं जाना नहीं
कुछ पूछना नहीं 
कुछ कहना नहीं 
कोई समस्या नहीं 
ऊपर की दुनिया में क्या हो रहा है 
वहां कितना शोर है 
कितनी परेशानियां हैं 
किसी को कुछ पता नहीं


रविवार, 19 जुलाई 2015

मेरा बदला

तुमने सताया मुझको
उसने ठुकराया मुझको
सबने भुलाया मुझको
सोच लिया मैंने
अब मेरी बारी है
गिन गिन के बदले लेने की
चुन चुन के सताने की

पर, नहीं नहीं
ऐसा नहीं है
आप जो समझ रहे हैं
वैसा कुछ भी नहीं है
मैं नहीं सताऊँगा तुमको
नहीं ठुकराऊंगा उसको
नहीं भूल पाऊंगा किसीको
हाँ, पर जब जाऊँगा
बटोर के ले जाऊंगा
सारे दर्द इस दिल के
और हर दर्द के आगे
हर टीस के साथ
लिख दूंगा एक नाम
वैसे ही
जैसे हर तोहफ़े पे लिखा होता है
किसी न किसी का नाम
दर्दों की हर नुमाइश और मुआयने पर
मेरे हर दर्द के साथ होगा एक नाम

अपने दर्दों की अपने ज़ख्मों की
अपनी टीस और धोखों की
लम्बी फ़ेहरिस्त को
जब वो देखेंगे
उनके ज़ेहन में आप सबके नाम
और चेहरे दिखेंगे
छप जायगा उनकी आँखों में
सबका सब कुछ किया कराया
कट जाएगी रसीद
नफ़े नुकसान की

ख़ैर ये लेन देन तो चलता ही रहता है
यहाँ नहीं तो वहां भरना पड़ता है
पर आप ये न समझें कि ये मेरा कसूर है
मैंने तो सिर्फ आपका नाम लिखा था
वरना वो कहते कहां से लाये
इतना कीमती सामान
कैसे कमाए
ऐसे अजीब दर्द, इतने ज़बरदस्त धोखे
ये सब आप खुद तो ये नहीं कर सकते थे

अब देखिये मेरी भी मजबूरी थी
कोई चीज़ लावारिस भी नहीं हो सकती
हर चीज़ के साथ कोई नाम होता ही है
इसीलिए लिखे आपके नाम
सिर्फ आप के तोहफों के आगे
मजबूरी थी माफ़ कीजिये
पर वहां पर हिसाब में
कोई कोताही नहीं हो सकती
पहले मुझे लगा था
कि मैं बदला लूँगा
या बदला ले रहा हूँ आपसे
पर नहीं, मुझे कुछ करने की
ज़रुरत नहीं थी
असल में किसी को कुछ करने की
ज़रुरत नहीं होती
ये लेखा जोखा अपने आप होता है
ख़ुद ही चलता है
अगर मैं वो नाम न लिखता
तो भी आपकी रसीद कट जाती
मैं बिलावजह बदले के लिए परेशान रहा
अपनी बारी का इंतज़ार करता रहा
पर सबक़ ये सीखा
कोई ज़रुरत ही नहीं थी
किसी बदले की
बदले के इंतज़ार की
... अपनी बारी की

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...