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रविवार, 26 जुलाई 2015

मेहमान नवाज़ दर्द

Photograph for illustration only
सुनी मैंने एक हल्की सी दस्तक
ज़रा सा मुड़ा मैं उस तरफ
उधर, दरवाज़े की तरफ
देखूं तो ज़रा, कौन है भला
उठने लगा बिस्तर से
हलांकि, ज़रा मुश्किल से

कहाँ जा रहे हो बिला वजह
वो गरजा,
मैं फ़ुसफ़ुसाया,
तुमने दस्तक नहीं सुनी क्या
नहीं, लेटे रहो यहीं पर
मैं बोला, मेहमान लौट जाये अगर
मुझे जाना ही होगा
तो मुझे भी साथ ले जाना होगा

ख़ैर, कमर के दर्द को साथ खींचते हुए
लड़खड़ाते संभलते हुए
खोला दरवाज़ा
ये क्या, यहाँ कोई भी नहीं !
पर मेरी कमर से आवाज़ आयी तभी
जी कौन हैं आप
मैं, एक दर्द हूँ जनाब
दर्द तो मैं भी हूँ
पर कौन से दर्द हैं आप
कंधे का हूँ
आइए आइए मैं यहाँ अकेला  ही रहता हूँ
इसे बिस्तर पर ही लिटाये रखता हूँ
कोई साथी नहीं मेरा,
मेरा साथ निभाने को
इसकी तड़प सुनने सुनाने को
अब मज़ा रहेगा जब मिल बैठेंगे दर्द दो
हम बीच में कहीं मिला करेँगे
और खूब बातें किया करेंगे
जी मेहरबानी आपकी
मुझे एक नया घर देने के लिए
वरना आजकल कौन अपने घर
दर्द को बुलावा देता है
पहले आप
जी ठीक आपके बाद

ख़ैर, किसी को पा कर सामने
दरवाज़ा बंद कर दिया मैंने
चिटकनी लगाने को जो हाथ उठाया
तो कंधे में हल्का सा दर्द पाया

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...