मंगलवार, 28 जुलाई 2015

दो क़ब्र

याद आती है मुझे,
अपने एक सवाल की 
ज़िन्दगी के सवाल की
उस सवाल के जवाब की
जवाब के इंतज़ार की 
फिर,
कुछ और इंतज़ार की

इंतज़ार तुम्हारे इधर मुड़ने का
उँगलियों में उलझे
दुपट्टे के सुलझने का 
झुकी नज़रों के उठने का 
मुझसे मुख़ातिब होने का 
होठों के खुलने का ...

इस इंतज़ार में,
मैं ज़िन्दगी के कितने बरस
जी कर गया 
तुम्हारे साथ एक उम्र
गुज़ार कर गया 

पर अभी तक हो सका 
तुम्हारा इधर को मुड़ना
दुपट्टे का सुलझना
नज़रों का उठना,
होठों का हिलना
और ज़बां का कुछ कह सकना ...

दूर एक पेड़ के नीचे 
फूलों से ढके 
दो साए से नज़र आते हैं 
गौर से देखो
दो कब्र हैं वो
 
एक मेरे सवाल की 
दूसरीतुम्हारे जवाब की 




कहां हो तुम

कहां हो तुम

कितना वक़्त गुज़र गया  
तुम्हें देखे, सुने,
महसूस किये 

ये दिन, ये रात
सुबह, शाम
मिल गए, घुल गए
एक दूसरे में 
ख़त्म हो गया फर्क 
अँधेरे और उजाले का 
कहां हो तुम 

चले गए तुम जाने कहां 
शायदतुम्हे जाना था जहां 
अब तुम्हारे नये अपने हैं   
और पुराने पराये हैं  

ख़ाली हो गया जहाँ मेरा
तुम्हारे चले जाने से 
अब मैं और मेरा ये खालीपन 
पूरा कर रहे हैं एक दूसरे की कमी को
दोनों को इंतजार है तुम्हारा

कहां हो तुम



शतरंज के मोहरे

बाबर, एलेग्जेंडर, चंगेज़ 
मुग़ल, जापानी, अंग्रेज़
अकबर, औरंगज़ेब, माओ  
हिमलर, स्टालिन, हिरोहितो
सद्दाम हुसैन, इदी अमीन
तिमूर, अफ़ज़ल, गज़नी

जीतने वाले, हारने वाले
मरने वाले, मारने वाले
एक अँधेरे पिटारे में बंद
एक दूसरे के ऊपर
कूड़े की तरह,
बेतरतीब फेंके हुए
न कोई बात चीत
न कोई हरकत
पर हाथ में तलवार पकड़े
ढ़ाल जकड़े
ताज पहने, पगड़ी बांधे

किसी ने भी ये बात न मानी
ख़त्म हो चुकी थी उनकी कहानी



सोमवार, 27 जुलाई 2015

ये दुनिया यहीं रहेगी

बीत रहा है वक़्त
कट रही है ज़िन्दगी
सारे नक़्शे देख लिए
अब न कोई राह बची
न बचा चौराहा कोई
न कोई सड़क, न मोड़
न कोई रहनुमा, न मंज़िल
पर रास्ते के नाम पर है
एक पगडंडी
सांप सी बल खाती,
दूर तक जाती दिख रही है
मेरे पैरों तले है जिसकी पूंछ
पर सर दिखाई नहीं देता
शायद आगे होगा
वहां उन पहाड़ों के आगे
उस घाटी के परे
पता नहीं कहाँ होगा
या कहीं होगा भी या नहीं
वो जहाँ भी होगा
ये दुनिया वहीं खत्म होगी
जैसे हर चीज़ ख़त्म हो जाती है

पर ये दुनिया वहां ख़त्म होगी
क्या ये कहना सही होगा ?
शायद नहीं, बिलकुल नहीं
जो हमें दिखाई नहीं देता
ज़रूरी नहीं कि वो होगा 
नहीं
ये हमारी आँखों की कमज़ोरी हो सकती है
दिमाग़ की हद्द हो सकती है
दुनिया की हद्द नहीं हो सकती
ये दुनिया कहीं ख़त्म नहीं हो सकती
इंसान जिस जहान को जानता है
इंसान ने जिस जहान को
छुआ है, ख़ुद बनाया है
वो भले ख़त्म हो जाए
पर जो ज़मीं उसने देखी ही नहीं
उसकी रवानी कैसे ख़तम होगी
वो तो चलती रहेगी
कोई सुने या न सुने
अपनी कहानी कहती रहेगी

गुज़र जायेंगे हम
गुज़र जाओगे तुम
मिट जायेंगी मुसकानें
धूल हो जायेंगे ग़म
ख़तम हो जायेंगे कहने वाले
राख हो जायेंगे सुनने वाले
पर ये दुनिया... यहीं रहेगी
और कहती रहेगी
अपनी ज़बानी
अपनी कहानी
हम सब की कहानी...







रविवार, 26 जुलाई 2015

पूरे, आधे-अधूरे

ज़िन्दगी में मिले कई 
कभी हाँ कभी न वाले दोस्त 
कभी वादे निभाने 
कभी न निभाने वाले दोस्त 
उनकी भावनाएं रूकती और चलती हैं ऐसे 
दिवाली की जलती बुझती लाइटें हों जैसे 
अब ये जगह मुझे रास नहीं आ रही 
या शायद इस जगह को ही मैं नहीं भा रहा 
यहाँ एक गीत याद आया,
'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
वाक़ेई इस गीत ने मेरी ज़रुरत समझी है 
मुझे एक नयी दुनिया की तलाश करनी चाहिए  
भले ही ऐसी ही पर दूसरी
इसलिए तुम बिलकुल परेशानी मत उठाओ 
और रहने दो वो अपने बचे हुए कस्में वादे 
आधे अधूरे ही 
जो बाकी हैं वो हो जायेंगे पूरे 
शायद हो ही जायेंगे
कहीं और, किसी दूसरी दुनिया में

फिर ये ज़रूरी तो नहीं 
कि सब कुछ पूरा ही हो ज़िन्दगी में  
दुनिया में आधी अधूरी चीज़ें भी होती है 
और वो खूबसूरत भी हो सकती हैं 
बल्कि होती हैं 
अधखिली कलियाँ कम नहीं होतीं 
खिले हुए फूल से 
आधी मुस्कान
आधा चाँद 
चौदवीं का चाँद 
आधे पहने कपड़े
आधी हाँ आधी ना 

तो जा रहा हूँ 'दोस्त' 
पर शायद आधे मन से 
ढूँढने वो जहाँ, जहाँ 
अधूरे ख्वाबों की 
अधूरे वादों की 
अधूरे रिश्तों की
अधूरी ही सही 
पर इज्ज़त होगी
इज्ज़त होगी अधूरेपन की



मेहमान नवाज़ दर्द

Photograph for illustration only
सुनी मैंने एक हल्की सी दस्तक
ज़रा सा मुड़ा मैं उस तरफ
उधर, दरवाज़े की तरफ
देखूं तो ज़रा, कौन है भला
उठने लगा बिस्तर से
हलांकि, ज़रा मुश्किल से

कहाँ जा रहे हो बिला वजह
वो गरजा,
मैं फ़ुसफ़ुसाया,
तुमने दस्तक नहीं सुनी क्या
नहीं, लेटे रहो यहीं पर
मैं बोला, मेहमान लौट जाये अगर
मुझे जाना ही होगा
तो मुझे भी साथ ले जाना होगा

ख़ैर, कमर के दर्द को साथ खींचते हुए
लड़खड़ाते संभलते हुए
खोला दरवाज़ा
ये क्या, यहाँ कोई भी नहीं !
पर मेरी कमर से आवाज़ आयी तभी
जी कौन हैं आप
मैं, एक दर्द हूँ जनाब
दर्द तो मैं भी हूँ
पर कौन से दर्द हैं आप
कंधे का हूँ
आइए आइए मैं यहाँ अकेला  ही रहता हूँ
इसे बिस्तर पर ही लिटाये रखता हूँ
कोई साथी नहीं मेरा,
मेरा साथ निभाने को
इसकी तड़प सुनने सुनाने को
अब मज़ा रहेगा जब मिल बैठेंगे दर्द दो
हम बीच में कहीं मिला करेँगे
और खूब बातें किया करेंगे
जी मेहरबानी आपकी
मुझे एक नया घर देने के लिए
वरना आजकल कौन अपने घर
दर्द को बुलावा देता है
पहले आप
जी ठीक आपके बाद

ख़ैर, किसी को पा कर सामने
दरवाज़ा बंद कर दिया मैंने
चिटकनी लगाने को जो हाथ उठाया
तो कंधे में हल्का सा दर्द पाया

एक खुशनुमा ख़याल

मिल गया शायद 
वो कोना ज़िन्दगी का 
जहाँ कुछ सुकूं है 
थोडा आराम है, राहत है
उनके गर्म ख़यालों से,
मेरी गर्म ख़याली से 
उन लफ़्ज़ों के तानों से 
इस दिल के बानों से 
नयी चोटों  के दर्द से
पुराने दर्द उभर आने से

पर एका-एक मेरे मन ने
बना लिया एक घेरा सा 
ऊंची ऊंची दीवारों का
और कर दीं हैं बाहर इसके 
मुश्किलें और तकलीफें
महफूज़ लगता है अब इनके अन्दर 
लगता है बसबस जाऊं यहीं पर   

काश अब बदले कुछ भी 
इसके आगे
भले हो कोई रास्ता या मंजिल 
कोई पीछे  आगे 
पिघल के बह जाएँ भले 
दोस्ती दुश्मनी प्यार नफरत 
नहीं अब किसी की ज़रुरत 

नफरत से डर लगता है
प्यार से मन घबराता है
दुश्मनी के अंजाम बुरे होते हैं
दोस्ती भी तो कुछ मांगती है
अब इन सबका कोई डर नहीं
डर अगर है तो बस इतना
कि कल ये खुशनुमा ख़याल
निकले  महज़ एक सपना

शनिवार, 25 जुलाई 2015

धागा, एक ख्याल का

कुछ तो गिला है उनके  चले जाने का 
कुछ ये ग़म कि ये लोग मरते ही नहीं

ज़िन्दगी अगर उदास है उनके बग़ैर 
तो इनकी वजह से मौत भी है शर्मसार,

वो तो फैला देते थे बहारें मोहब्बत की 
इनसे सुलग जातीं हैं चिंगारियां नफरत की 

कितना फर्क़ है 'दोस्त' इस दुनिया के इंसानों में 
वो अगर भगवान् थे, तो ये शामिल हैं हैवानों में

वो कहां मैं कहां

सपनों की दुनिया में है उसका जहांऔर मैं हूँ यहां
खबर नहीं वो है कहां, कितनी दूर है मुझसेमैं हूँ जहां

उसके दोस्तों की महफ़िलवो खुश गवार लम्हे
मुझे मिला साथ इस तन्हाई कामैं हूँ जहां

वो खिलखिलाती शोख़ नज़रें  और हंसी के झरने
मुरझाए सपनों का गुलिस्तां है यहाँ, मैं हूँ जहां

दोस्तों का साथ, वो बाहों के हार, और दिल की बातें 
ढूंढता हूँ खुशियाँ अपने आगोश मेंमैं हूँ जहां

काश मेरे क़दम पहुँच पाते ज़ुल्फ़ के उस मोड़ तक
पर कहाँ वो ज़ुल्फ़, वो हसीन मोड़ और मैं हूँ कहां

काश कोई मोड जोड़ देता हमारी ज़िन्दगी को 'दोस्त'
पर नहीं थी किस्मत में तेरी रहगुज़रमैं हूँ जहां

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...