शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

मेरा वक़्त और मैं

कभी ऐसा सोचा
जिनको मिलना था 
वो बिना मिले ही चले गये 
और ख़त लिखा
कि तुमसे मिल कर बड़ा मज़ा आया
उस दिन मौसम कितना ख़ुशगवार था
चौदहवीं के चाँद पे निखार था
तारे भी बिखरे हुए थे
खुशबु के समंदर
हवा पे तैर रहे थे
कैसी अजीब बात है
इतनी सारी बातें लिख डालीं
जो हुई ही नहीं
कोई ऐसा कैसे लिख सकता है 
मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं 
और वो कहता है
हम मिल भी लिए 
पर ज़िक्र चाँद तारों का
खुशबू और हवाओं का
अब 
ख़याल आया ...
शायद मेरा वक़्त और मैं
एक दुसरे से बिछड़ गए हैं
वो धागे टूट गए हैं
जो मुझे मेरे समय से जोड़े रखते हैं 
मुझे जो कुछ कल औरपरसों
करना है / था 
वो सब हो चुका है 
मेरा आने वाला कल बीत चुका है





गुरुवार, 21 जनवरी 2016

नासमझ समझ

तन्हाई की तक़लीफ़,
परेशान न कर पायी मुझे
जुदाई की ज़हमत,
रुला ना पायी मुझे
ऐसा भी नहीं कि मैं ही
पत्थर-दिल हूँ
पर इस दिल की अगन
झुलसा न पायी मुझे
वो भी एक वक़्त था
कि हम उम्मीदों का शौक़ रखते थे
बैठे बैठे खिड़की पे
तुम्हारी राह तकते थे
इंतज़ार में पथरायी ऑंखें
रुला न पायीं मुझे
अब क्या कहें 'दोस्त'
कि क्या था हमारे बीच
क्या ये वो था
जो तुम न समझ सके
या वो, जो समझ न आया मुझे



शनिवार, 16 जनवरी 2016

... तो कितना अच्छा होता

अगर उसे सीने से न लगाया होता
अपना न बनाया होता
तन्हाई से न घबराया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसके चेहरे पे न ये दिल आया होता 
उसकी चाहत ने मुझे न भरमाया होता 
न उसे सर आँखों पर बिठाया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसकी दोस्ती ने दिल को न उलझाया होता 
सोचने की ताक़त को न डुबाया होता
एक के लिए सबको पराया न बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

इस रस्ते पर 
मैंने खुद को, इतना न बढ़ाया होता 
ग़र ज़मीं पर ही अपना घर बनाया होता 
एक बेवफ़ा को न अपना 'दोस्त' बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता







सोमवार, 2 नवंबर 2015

बेवफ़ा ख़याल

आप देख रहे हैं इसे 
ये है एक ख़्याल
जो मेरे घर आया, मुझसे मिला
और कहा मुझे तुम पसंद आये
क्या मैं तुम्हारे साथ रह सकता हूँ
तुम्हारी क़लम की रोशनाई से ढ़ल सकता हूँ
हड़बड़ी में हिचकिचाते हुए
गड़बड़ी में क़लम उठाते हुए
मैंने कहा क्यों नहीं
तुम मुझे इतनी इज़्ज़त दे रहे हो
तो आओ, रहो मेरे पास
मेरे ख़्यालों में
मेरी कविता में, शायरी में

मुस्करा कर वो मेरे काग़ज़ पर उतर आया
अब वो सबके सामने इतराता है
अपनी जगह दिखाता है
बड़ा ख़ुश नज़र आता है

पर जनाब इससे भी बेहतर
कई ख़ूबसूरत ख़्याल भी मिले
दूर से बड़े मज़ेदार भी लगे
एक तो 
नहाते वक़्त मेरे ग़ुसलख़ाने में पहुँच गया  
बड़ा ही अटपटा लगा मुझे
पर सोचा इतना ख़ूबसूरत ख़्याल !
मैंने उसका नाम ले लिया
एक दो बार ज़ोर से बोल भी दिया
कि याद रह जाए
मेरे साथ मेरे ज़ेहन में बस जाए
पर जनाब मुझे ख़ूबसूरती पर भरोसा नहीं है
उन्हें घमंड होता है ख़ुद पर
वो किसी और की कविता बनना चाहते हैं
किसी ज़्यादा मशहूर और अमीर की
जिसका 
पहले से ही बड़ा नाम हो
उसकी दुनिया चमकदार हो
और ऊंचे दाम हों
ख़ुशी ख़ुशी मैं गुसलखाने से बाहर आया
कागज़ क़लम दावत को सजाया
बड़े शौक़ से 
'दोस्त' जो सर झुकाया
तो उस ख़्याल को नदारद पाया



मैं कौन हूँ

कौन जानता है कितना किसके बारे में
उसके बारे में, इसके बारे में, अपने बारे में

लोग आते हैं, मिलते हैं, हिलमिल जाते हैं
पर क्या कोई कुछ सोचता है दूसरों के बारे में 

लगा था कि जी न पाऊंगा तुम्हारे बग़ैर मैं
थी ये कैसी ग़लत फेहमी अपने बारे में

वो हमसफ़र, हमनवां ये जाने-जिगर जानेजां
काश ये सब जानते इस ज़िन्दगी के बारे में

मैं जानता था तुम मेरी कमज़ोरी हो 'दोस्त'
पर मुझे पता न था अपनी ताक़त के बारे में




शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

... याद नहीं

यादों के नासूर थे, या ज़ख्म--जुदाई, याद  नहीं,
बस एक हल्का सा दर्द रह गया है, वजह याद नहीं

जब हम साथ थे, तो थी सारे जहाँ से दोस्ती,
तुम्हारे बाद कितनों ने निगाहें फेर लीं, याद नहीं 

निगाहें तो मिल ही जाती हैं, किसी न किसी से
पर किसी नज़र ने मुझसे कुछ कहा हो, याद नहीं

कहना, सुनना, कुछ  कहना या अनसुना करना
लफ्ज़ सिर्फ आवाज़ें रह गए हैं, मक़सद याद नहीं

अब भी बहुत से लोग करते हैं बहुत सी बातें मुझसे
दिल तक किसीकी बात पहुंची हो, याद नहीं

मैं डूबा रहा तुम्हारी बातों में, निगाहों में 'दोस्त'
कितनी गहराई थी अपनी दोस्ती में, ये भी याद नहीं 




एक अस्तित्वहीन बिंदु...

एक  बिंदु  था मैं 
केवल  एक  बिंदु 
  कोई  चेहरा,   शरीर 
 दिल   दिमाग 
 पहचान,  नाम 
पर  वो  मैं  था 
पूरी तरह से मैं  ही  था 
आवश्यकता  ही  नहीं  थी  किसी और चीज़  की 
मैं  अपने  उस एक-बिंदु-पन  में  ख़ुश  था
सम्पूर्ण  था... 

अब उस बिंदु जैसे  करोड़ों  बिंदु  हैं  मुझ में
मेरी  देह  में 
मेरे मस्तिष्क में 
ये  सारे बिंदु  संसार  के अनगिनत  बिन्दुओं  से  मिलते  हैं 
उलझते हैं 
झगड़ते हैं 
रोते हैं हँसते  हैं 
प्रेम  और  नफरतें  भी  करते  हैं 
कभी  दुनिया मेरे बिन्दुओं को  हुकुम देती है 
कभी मेरे  बिंदु  दुनिया  को  चलाना  चाहते  हैं 
दुनिया  पर राज करना चाहते  हैं

पर  ये  करोड़ों  बिंदु  उस  एक  बिंदु  की  पवित्रता  के  सामने  कुछ  नहीं 
उस  एक  बिंदु  जैसे सम्पूर्ण  नहीं 
शायद मेरा  अस्तित्व  खो  गया  है  इन अनगिनत  बिन्दुओं में 
इनकी  खींच-तान  में 
भगदड़ में... 

वापस  जाना  है  मुझे  उसी  स्थिति  में
उस  अस्तित्वहीन  अस्तित्व  में
उस 'एक  बिंदु'  अस्तित्व  में





यात्री, नाव या खेवैया

कितने आये,  कई गए, वो पराया था ये अपना है
खड़ा हूँ कबसे यहीं पर मैं, मुझे इंतज़ार अपना है |

कहाँ खो गया हूँ, ख़ुद ही, इसकी ख़बर नहीं मिलती
सोया हूँ या जागा, ये मैं ख़ुद हूँ या मेरा सपना है |

दिन गुज़र रहे हैं रातें भी, महीने और साल भी
वक़्त पे है ज़ोर किसका, वो जो कराये करना है |

सुना था वक़्त से ही है, वक़्त की हर शेह ग़ुलाम
सब चलता है इसके इशारों से, देखूं, मुझे क्या करना है |

ख़ुशनसीबों को मिल गयी निजात, वक़्त के फेरों से 
ज़िंदा बदनसीबों को क्या मालूम कब जीना कब मरना है |

कशमकश मिट गयी, असलियत दिख गयी ‘दोस्त’
मैं हूं एक नाव, मैं ही खेवैया, मुझे ही पार उतरना है |



...धीरे धीरे

धीरे धीरे,
बसें, ट्रेनें बढ गईँ
और कम हो गयी जगह
खड़े रहने की,
लटकने की।
धीरे धीरे,

निगल गए झोपड़े
फुटपाथों को
कम हो गयी
चौड़ाई सड़कों की

धीरे धीरे,
बढ़ गई कीमत

मकानों की
वड़ा पाव की
चमक कारों की
इमारतों की
ऊंचाई कचरे के ढेरों की
धीरे धीरे,
गहरी हो गयी खाई,
इनके और उनके बीच की



ये भी...?

हेलो, कैसे हो?
ठीक हूँ
आज क्या इरादा है?

आज? आज कुछ अलग करते हैं
अलग? मतलब?
मतलब अलग जैसे कि ...
हाँ हाँ जैसे कि क्या ?
चलो आज कुछ सोचते हैं
सोचें? मगर ...
अरे ओरिजिनल आईडिया, बिल्कुल क्रियेटिव
बैठ जायें?
हाँ ठीक है
खडे खड़े तो मुश्किल हो जाएगा

काफी वक्त लग सकता है
अखिर सोचना है कोई मज़ाक तो नहीं
पहली बार भी है ना, सोचना 
ठीक है आओ बैठो
अच्छा तो बताओ क्या सोचें?
क्या मतलब?
मतलब ये कि किस चीज़ के बारे में सोचें?
ओहो! तो ये भी सोचना पड़ेगा ?



चंदा मामा दूर के

आओ कल्पना की उड़ान भरें
अपने कदम चांद पर धरें

चलो परखें चांद की ज़मीन को
आधे अँधेरे आधी रोशनी को

अपना भार चांद पर जांचें
हिरन के जैसे भरें कुलांचें

पहाड़ और पाताल में भागें
कोई पीछे तो कोई आगे

तोडें कीर्तिमान ऊंची कूद के
सब मिल गायें चंदा मामा दूर के











डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...