एक बिंदु था मैं
केवल एक बिंदु
न कोई चेहरा, न शरीर
न दिल न दिमाग
न पहचान, न नाम
पर वो मैं था
पूरी तरह से मैं ही था
आवश्यकता ही नहीं थी किसी और चीज़ की
मैं अपने उस एक-बिंदु-पन में ख़ुश था
सम्पूर्ण था...
अब उस बिंदु जैसे करोड़ों बिंदु हैं मुझ में
मेरी देह में
मेरे मस्तिष्क में
ये सारे बिंदु संसार के अनगिनत बिन्दुओं से मिलते हैं
उलझते हैं
झगड़ते हैं
रोते हैं हँसते हैं
प्रेम और नफरतें भी करते हैं
कभी दुनिया मेरे बिन्दुओं को हुकुम देती है
कभी मेरे बिंदु दुनिया को चलाना चाहते हैं
दुनिया पर राज करना चाहते हैं …
पर ये करोड़ों बिंदु उस एक बिंदु की पवित्रता के सामने कुछ नहीं
उस एक बिंदु जैसे सम्पूर्ण नहीं
शायद मेरा अस्तित्व खो गया है इन अनगिनत बिन्दुओं में
इनकी खींच-तान में
भगदड़ में...
वापस जाना है मुझे उसी स्थिति में
उस अस्तित्वहीन
अस्तित्व में
उस 'एक बिंदु' अस्तित्व में
