शुक्रवार, 20 जून 2025
मिज़ाज गर्म है
शनिवार, 21 दिसंबर 2024
एक ख्वाहिश ऐसी
ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी
कि पूछो मत कैसी कैसी
बेहद अजीब हों जैसी
बिल्कुल नामुमकिन हों, वैसी
मैंने कहाँ से सीखा
अरे ये तो आसान है
इसकी कोई क़ीमत नहीं
आसान ख़्वाहिश की ख़्वाहिश भी, ख़्वाहिश कैसी
तो मैंने सोचा कि
ऐसी हर एक चीज़, जो हो एक ग़ज़ब की मुश्किल
जो हो इतनी मुश्क़िल, इतनी मुश्क़िल
कि उसकी ख़्वाहिश से ही दम घुट जाये
बरसों की मेहनत के बाद आख़िर
मुझे मिल ही गया वो ख़्याल
पर मिल न सके
सामने हो पर
उसे छुआ ना जा सके
ये दिखाई देते हैं, बस
बस इतना ही
देखिए और खुश रहिये
चलिए 'दोस्त' मुश्किल थोड़ी आसान कर देते हैं
जी मेरा मतलब है ये लफ्ज़ 'हज़ारों' हटा देते हैं
ग़ालिब बड़े शायर थे मैं उनका
एक हज़ारवां हिस्सा भी नहीं हूँ
"एक ख़्वाहिश ऐसी कि उस एक से ही दम निकले"
सोमवार, 4 नवंबर 2024
ज़िन्दगी या मयकदा
आधी रात हो चुकी थी
यानी मयकदे की शाम ढलने लगी थी
लोग कुछ अजीब तरह से हिलने-डुलने लगे थे
जैसे आलस और थकावट ने धर लिया हो
ज़्यादातर लोगों की आवाज़ें भी धीमी हो गई थीं
अब साकी की तरफ़ एक उंगली की बजाय
पूरी हथेली उठ रही थी
पीछे की मेज़ों का शोर ख़त्म हो चला था
एक साक़ी परदे के पीछे चली गयी थी
ख़ैर, कटोरी में बचे चने के आख़िरी दो दाने
मुंह में डालते हुए
मैंने दोनों हाथ घुटनों पर रखे
दीवार की घड़ी पर नज़र डाली
सही वक़्त है
उठने के लिए
सामने रखे नोटों और सिक्कों पर नज़र डाली
सही से थोड़े ज़्यादा लगे
मतलब सही थे
मेज़ का सहारा ले कर
मैं खड़ा हो गया
अब मुझे तीन क़दम सीधे चलना है
फिर गल्ले के सामने से निकलते हुए दो क़दम बायें
ऐसे वक़्त पर ये हिसाब कर लेना चाहिए
दरवाज़े के बाहर निकलने से पहले
सब चुपचाप बैठे थे
किसी ने मुझे न देखा न पहचाना
परदे के पीछे साकी अभी भी अपनी तश्तरी पर झुकी हुई थी
गल्ले पर बैठे आदमी का हिलता हाथ
सलाम जैसा लगा
मैं भी सलाम बुदबुदा दिया
शाम की शुरुआत में लोग ज़्यादा ख़ुश होते हैं
ऊंची आवाज़ में बातें करते हैं
चाल तेज़ होती है
प्याले भी जल्दी ख़त्म हो जाते हैं
गुरुवार, 26 सितंबर 2024
हमारी स्थिरता
धरती अपनी धुरी पर ४५० मीटर प्रति सेकंड की गति से घूम रही है
धरती अपने सितारे सूर्य के चारों ओर ३० किलो मीटर प्रति सेकंड की गति से चक्कर लगा रही है
सूर्य, पूरे सौरमंडल के साथ अपनी आकाश गंगा में २३० किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चल रहा है
और आकाश गंगा एक सेकंड में अपने अनगिनत तारों, ग्रहों, शायद डार्कमैटर इत्यादि के साथ ६०० किलो मीटर आगे निकल जाती है।
अब भी अगर किसी को लगता है की हम एक ही जगह पर खड़े हैं, तो उन्हें अपना विचार बदलने का अच्छा मौका है
रविवार, 7 अप्रैल 2024
सच सिर्फ सच
दोपहर के इस वातावरण में सुबह की सुरीली चिड़ियाँ नहीं चहकतीं, कोई इक्का दुक्का कोयल सुनाई दे जाये, तो दे जाये। अधिकतर कौव्वों की ध्वनि ही सराउंड चॅनेल में तैर रही थी। यातायात भी लगभग कुछ नहीं के बराबर था। नगण्य। कदाचित इसे ही मनहूसियत कहते होंगे।
विचारों की इस उठा-पटक में मैंने कुछ बेहद अजीब और अलग तरह की आवाज़ सुनी। उस जैसी आवाज़ का घर के सामने वाली सड़क पर सुनाई पड़ना लगभग असम्भव था। पर ये आवाज़ तो घोड़े की टाप जैसी नहीं थी। टेलेविजन की साउंड डिज़ाइन में मैंने घोड़े के टापों के साथ काफी काम किया है। वो तो बिलकुल क्रिस्प होती है, क्लिप-क्लॉप जैसी। क्या बला है ये ? फिर लगा टापों की ध्वनि में कुछ घुंघरू जैसी आवाज़ें भी मिली हुई थीं। अब तो लगा कि ये घोड़ा मुझे खिड़की तक खींच कर ही मानेगा। मैंने ज़रा सा पर्दा हटा कर नीचे झांका।
देखा ना। मुझे पता था कि ये आवाज़ घोड़े की नहीं हो सकती थी। उस जानवर ने ज़ोर से अपना चेहरा दाएं-बाएं हिलाया। अब पता चला घुंघरुओं में पत्थरों की ध्वनि भी मिली हुई थी। अगर मैं इतनी नींद में ना होता तो मुझे ज़बरदस्त झटका लगा होता। नीचे,गेट के ठीक बाहर एक विशालकाय भैंसा खड़ा था। उसके गले में विभिन्न तरह की रंग-बिरंगी मालाएं थीं। बहुत सारी घंटियां भी थीं। माथे पर बड़ा सा लाल टीका था। सबसे बड़ा अचम्भा तो तब हुआ जब मैंने एक बेहद काले आदमी को उसकी पीठ पर सवारी करते देखा। नहीं मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा था, निश्चित, निश्चित।
मैंने बैल और गाय ले कर पैसे मांगने वाले लोग कई बार देखे हैं। पर ये आदमी तो भैंसे पर चढ़ा हुआ था। सब कुछ इतना चकित करने वाला था कि मेरा सामान्य ज्ञान इसे समझने में विफल हो गया। वो बेहद काले सज्जन भी अपने भैंसे की तरह ही सज्जित थे, कदाचित उससे अधिक। ख़ैर वो आहिस्ता से सरक कर अपनी सवारी से नीचे उतर गए। भैंसा फिर हिनहिनाया। उन सज्जन ने भैंसे की गर्दन को सहलाया और ऊपर की ओर देखा। मेरा पर्दा दो उंगली बराबर ही खुला होगा। पर उनकी ऊपर देखती नज़र को भांप कर मेरी सांस अटक गयी। मैंने पर्दा छोड़ दिया। कौव्वों की कैं-कें बढ़ गयी थी। शायद वो भैंसे से परेशान हो रहे थे। या शायद घंटियों और मालाओं की ध्वनि से। कुछ क्षणों के बाद मुझे लगा कि कोई भारी भरकम इंसान सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। वो नंगे पैर है पर उसका भार हर सीढ़ी पर सुनाई पड़ता है। उसके गले की मालाएं भी बहुत शोर कर रही थीं।
दरवाज़े पर एक बेहद भारी हाथ ने दस्तक दी। केवल एक दस्तक।
शुक्रवार, 29 मार्च 2024
चलते चलते
भोजन का समय
बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बच्चों का शोर दूसरी ओर
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था
गुरुवार, 14 मार्च 2024
उसकी ट्रेन
साधारणतया जैसी या जितनी भीड़ होती है वैसी ही थी
भीड़ कम थी, या ज़्यादा थी
ये निर्भर करता है कि इसे कौन जांच रहा है
और वो कहाँ से आया है
वातावरण में ठक-ठक की आवाज़ हो रही थी
वो अपने-अपने डिब्बों को ठोक रहे थे
उसे पता था कि इसके अपराधी स्पोर्ट्स टाइप के जूते हैं
जिन्हें पॉलिश नहीं किया जाता...
चर्चगेट की ट्रेन आयी
उसके रुकने के काफी पहले ही हुजूम आगे बढ़ा
झिझकता हुआ वो भी बढ़ा
पर थोड़ा पीछे रहा
ट्रेन रुकी, पहले लटके हुए लोग
जैसे उन्हें अपने पर नियंत्रण ही नहीं था
प्लेटफॉर्म के लोग ट्रेन के अंदर जाने के लिए ऐसे लालायित थे
जैसे एक बंधा हुए भूखा कुत्ता सामने पड़ी हड्डी को देख रहा हो
उतरती भीड़ ने बहुत ज़ोर का शोर मचाया
बिना कपड़े फटे या जेब कतरों के शिकार हुए,
ट्रेन से उतर जाने और चढ़ने को दिन की उपलब्धि कहा जा सकता है...
उसने सोचा चलो अगली बार सही
ट्रेन ६ मिनट के बाद आने वाली थी
६ मिनट गुज़रने में समय ही कितना लगता है
दो या तीन मिनट, बस, इससे ज़्यादा नहीं
बगल के प्लेटफॉर्म पर दूसरी तरफ जाने वाली ट्रेनें आ-जा रही थीं
यात्री भी एक तरह से उदासीन लग रहे थे
जैसे उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी...
अगली ट्रेन आई
भीड़ फिर उसी तरह आगे बढ़ी
इस बार वो भीड़ का हिस्सा बिल्कुल नहीं बना
थोड़ा पीछे रहा
'ख़बरदार रहना' का शोर फिर से हुआ
पर उसने अनसुना कर दिया
ट्रेन के रुकने से पहले ही उसने एक डिब्बे के बायीं ओर
एक छोटा सा गैप देख लिया था
सही समय पर
और जैसे कहते हैं ना, 'लाइक ए फ्लैश'
उस ज़रा सी खुली जगह में विलीन हो गया
वो भी और लोगों की तरह पहुंच ही जायेगा
उसे लगा कि
उसके मोबाइल पर एक मेसेज आया है
चलो शायद कोई तो सोच रहा है
उसके बारे में
शनिवार, 18 नवंबर 2023
सफ़ाई
कि अगर किसी वजह से
आंसू बहने लग जाएँ
और आँखें साफ़ हो जाएँ
नज़र भी ठीक हो जाये
दिखने लग जाये कि
दुनिया कैसी है
साफ़ सुथरी या मैली कुचैली
लोग कैसे हैं
कैसे चलते फिरते हैं
वो उचित व्यवहार कर रहे हैं,
या अनुचित, अथवा कदाचित निकृष्ट
संसार में हिंसा कितनी है
किसी जगह पर किसी समय पर
प्रेम या अहिंसा भी नज़र आती है या नहीं
चलो इन सब पर तो मेरा नियंत्रण है नहीं
फिर भी और कुछ नहीं तो
मेरी आँखें तो साफ़ कर दीं
रविवार, 29 अक्टूबर 2023
कुछ अनमोल पल
एहसास की रोशनी
एकाएक एक दिन
कर गयी रोशन
इस दिल के कुछ ख़ाली अँधेरे खाने
पुरानी बंद किताब के पन्ने
काफी अजीब लगा
बहुत सारी पुरानी चीज़ें,
चेहरे, लोग, बातचीत
एक नया शहर, नया घर, नया कमरा
नई ज़िन्दगी, नई नौकरी, नई बेकारी
हाँ, नए परिवार में चंद पुराने दोस्तों ने माहौल बदल दिया
हाथ मिलाना गले लगना शोर मचाना
"अरे तुम भी ! यहाँ? वाह मज़ा आ गया।"
इतना जाना पहचाना तहलका
जैसे बीच समुद्र एक हरा भरा द्वीप मिल गया हो
मेहमान अभी कमरे के दरवाज़े पर ही था
अंदर संदूक रखने का भी मौका नहीं मिला था
शोर भी बंद नहीं हुआ था
उस परिवार के साधारण से लोग चारों ओर खड़े थे
इस हंगामे के मज़े ले रहे थे
भरा पूरा परिवार था
बा थीं तीन बच्चे और मम्मी पापा
कुछ मुस्करा रहे थे कुछ हंस रहे थे
बा को ये सब पागलपन लग रहा था
एक लम्बी सी निक्कर पहने तुकाराम
एक हाथ से अपनी हंसी छुपा रहा था
इन सबसे अलग सफ़ेद फ्रॉक में एक बच्ची थी
भावरहित चुप और शांत
उसका दांया कन्धा दीवार पर टिका था
पर उसकी बड़ी-बड़ी गोल आँखें
मेहमान पर टिकी थीं
मेहमान ने एक सरसरी सी नज़र उस पर डाली
और देखा कि
उसकी मासूम निगाहें उस पर ही टिकी थीं
ये देख कर मेहमान ने उसे नमस्ते कह दिया
उस बच्ची को ये पता नहीं था कि
किसी को लगातार इतनी देर तक देखना
मासूमियत की निशानी है
और मेहमान को ये पता नहीं था कि
अपनी ज़िन्दगी के इस बेहद नाज़ुक मोड़ पर
वो कितनी सही जगह आ गया है
बुधवार, 11 अक्टूबर 2023
एक अनजानी वजह
कुछ दिन पहले कुछ बदल गया
आहिस्ता से ...
बेहद आहिस्ता से
कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई
लगा ही नहीं कि कुछ बदला है
सब ठीक ही लगता रहा
आख़िरकार जब जो जैसा रहता था
वैसा नहीं रहा
कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था
अब नहीं हो रहा
एक अर्से से
मुझे पता है कि अगर कोई चीज़
बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती
पता ही नहीं चलता
लगता रहता है होगा कुछ,
ठीक हो जायेगा
ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं
अपनी अपनी उलझनों के साथ
क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है
बातें दो तरह से असर करती हैं
एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात
या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले
ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है
तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही
और किसी की वजह पर शक नहीं किया जाता
किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है
पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं
किसी को नहीं पता कि
कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है
... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा
डर नूतन से
ठीक है, ठीक है, माना । क्या माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...
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मैं कौन था और क्या बन गया हूँ पहले बेहतर था, या अब हूँ पहले कुछ था भी, या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ अगर कुछ था तो क्या था और अगर अब कुछ हूँ...
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मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग ह...









