शुक्रवार, 29 मार्च 2024
चलते चलते
भोजन का समय
बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बच्चों का शोर दूसरी ओर
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था
गुरुवार, 14 मार्च 2024
उसकी ट्रेन
साधारणतया जैसी या जितनी भीड़ होती है वैसी ही थी
भीड़ कम थी, या ज़्यादा थी
ये निर्भर करता है कि इसे कौन जांच रहा है
और वो कहाँ से आया है
वातावरण में ठक-ठक की आवाज़ हो रही थी
वो अपने-अपने डिब्बों को ठोक रहे थे
उसे पता था कि इसके अपराधी स्पोर्ट्स टाइप के जूते हैं
जिन्हें पॉलिश नहीं किया जाता...
चर्चगेट की ट्रेन आयी
उसके रुकने के काफी पहले ही हुजूम आगे बढ़ा
झिझकता हुआ वो भी बढ़ा
पर थोड़ा पीछे रहा
ट्रेन रुकी, पहले लटके हुए लोग
जैसे उन्हें अपने पर नियंत्रण ही नहीं था
प्लेटफॉर्म के लोग ट्रेन के अंदर जाने के लिए ऐसे लालायित थे
जैसे एक बंधा हुए भूखा कुत्ता सामने पड़ी हड्डी को देख रहा हो
उतरती भीड़ ने बहुत ज़ोर का शोर मचाया
बिना कपड़े फटे या जेब कतरों के शिकार हुए,
ट्रेन से उतर जाने और चढ़ने को दिन की उपलब्धि कहा जा सकता है...
उसने सोचा चलो अगली बार सही
ट्रेन ६ मिनट के बाद आने वाली थी
६ मिनट गुज़रने में समय ही कितना लगता है
दो या तीन मिनट, बस, इससे ज़्यादा नहीं
बगल के प्लेटफॉर्म पर दूसरी तरफ जाने वाली ट्रेनें आ-जा रही थीं
यात्री भी एक तरह से उदासीन लग रहे थे
जैसे उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी...
अगली ट्रेन आई
भीड़ फिर उसी तरह आगे बढ़ी
इस बार वो भीड़ का हिस्सा बिल्कुल नहीं बना
थोड़ा पीछे रहा
'ख़बरदार रहना' का शोर फिर से हुआ
पर उसने अनसुना कर दिया
ट्रेन के रुकने से पहले ही उसने एक डिब्बे के बायीं ओर
एक छोटा सा गैप देख लिया था
सही समय पर
और जैसे कहते हैं ना, 'लाइक ए फ्लैश'
उस ज़रा सी खुली जगह में विलीन हो गया
वो भी और लोगों की तरह पहुंच ही जायेगा
उसे लगा कि
उसके मोबाइल पर एक मेसेज आया है
चलो शायद कोई तो सोच रहा है
उसके बारे में
शनिवार, 18 नवंबर 2023
सफ़ाई
कि अगर किसी वजह से
आंसू बहने लग जाएँ
और आँखें साफ़ हो जाएँ
नज़र भी ठीक हो जाये
दिखने लग जाये कि
दुनिया कैसी है
साफ़ सुथरी या मैली कुचैली
लोग कैसे हैं
कैसे चलते फिरते हैं
वो उचित व्यवहार कर रहे हैं,
या अनुचित, अथवा कदाचित निकृष्ट
संसार में हिंसा कितनी है
किसी जगह पर किसी समय पर
प्रेम या अहिंसा भी नज़र आती है या नहीं
चलो इन सब पर तो मेरा नियंत्रण है नहीं
फिर भी और कुछ नहीं तो
मेरी आँखें तो साफ़ कर दीं
रविवार, 29 अक्टूबर 2023
कुछ अनमोल पल
एहसास की रोशनी
एकाएक एक दिन
कर गयी रोशन
इस दिल के कुछ ख़ाली अँधेरे खाने
पुरानी बंद किताब के पन्ने
काफी अजीब लगा
बहुत सारी पुरानी चीज़ें,
चेहरे, लोग, बातचीत
एक नया शहर, नया घर, नया कमरा
नई ज़िन्दगी, नई नौकरी, नई बेकारी
हाँ, नए परिवार में चंद पुराने दोस्तों ने माहौल बदल दिया
हाथ मिलाना गले लगना शोर मचाना
"अरे तुम भी ! यहाँ? वाह मज़ा आ गया।"
इतना जाना पहचाना तहलका
जैसे बीच समुद्र एक हरा भरा द्वीप मिल गया हो
मेहमान अभी कमरे के दरवाज़े पर ही था
अंदर संदूक रखने का भी मौका नहीं मिला था
शोर भी बंद नहीं हुआ था
उस परिवार के साधारण से लोग चारों ओर खड़े थे
इस हंगामे के मज़े ले रहे थे
भरा पूरा परिवार था
बा थीं तीन बच्चे और मम्मी पापा
कुछ मुस्करा रहे थे कुछ हंस रहे थे
बा को ये सब पागलपन लग रहा था
एक लम्बी सी निक्कर पहने तुकाराम
एक हाथ से अपनी हंसी छुपा रहा था
इन सबसे अलग सफ़ेद फ्रॉक में एक बच्ची थी
भावरहित चुप और शांत
उसका दांया कन्धा दीवार पर टिका था
पर उसकी बड़ी-बड़ी गोल आँखें
मेहमान पर टिकी थीं
मेहमान ने एक सरसरी सी नज़र उस पर डाली
और देखा कि
उसकी मासूम निगाहें उस पर ही टिकी थीं
ये देख कर मेहमान ने उसे नमस्ते कह दिया
उस बच्ची को ये पता नहीं था कि
किसी को लगातार इतनी देर तक देखना
मासूमियत की निशानी है
और मेहमान को ये पता नहीं था कि
अपनी ज़िन्दगी के इस बेहद नाज़ुक मोड़ पर
वो कितनी सही जगह आ गया है
बुधवार, 11 अक्टूबर 2023
एक अनजानी वजह
कुछ दिन पहले कुछ बदल गया
आहिस्ता से ...
बेहद आहिस्ता से
कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई
लगा ही नहीं कि कुछ बदला है
सब ठीक ही लगता रहा
आख़िरकार जब जो जैसा रहता था
वैसा नहीं रहा
कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था
अब नहीं हो रहा
एक अर्से से
मुझे पता है कि अगर कोई चीज़
बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती
पता ही नहीं चलता
लगता रहता है होगा कुछ,
ठीक हो जायेगा
ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं
अपनी अपनी उलझनों के साथ
क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है
बातें दो तरह से असर करती हैं
एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात
या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले
ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है
तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही
और किसी की वजह पर शक नहीं किया जाता
किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है
पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं
किसी को नहीं पता कि
कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है
... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा
शनिवार, 4 फ़रवरी 2023
सलाह एक दोस्त की
पहले बेहतर था, या अब हूँ
पहले कुछ था भी,
या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ
अगर कुछ था तो क्या था
और अगर अब कुछ हूँ तो क्या हूँ, कौन हूँ
पर बीच का वो समय
जब मैं कुछ से कुछ और में बदल रहा था
क्या मुझे उसके बारे में नहीं सोचना चाहिए?
वो भी आखिर मैं ही था
वो मेरे ही जीवन का समय था
हो सकता है वो समय ही बेहतर रहा हो
जब मैं बदलाव के तूफ़ानों से गुज़र रहा था
जी, बदलाव
ये शब्द कितना अर्थपूर्ण,
कितना पूर्ण लगता है
अगर चीज़ें बदल नहीं रही हैं
तो वो वास्तव में हैं ही नहीं
वो अस्तित्वहीन हैं
अर्थात शायद जब मैं 'कुछ' बन जाऊँगा
सोमवार, 2 जनवरी 2023
क्या है वक़्त
क्या ये कहीं छुपा बैठा था
कि एकाएक साथ हो लिया
या ऊपर से टपक पड़ा
और सामने आ गया
वक़्त के पहले कोई ये नहीं सोचता था
कि देर हो गयी
या देर हो रही है
जल्दी चलना पड़ेगा
वरना अँधेरा हो जायेगा
दुकान बंद हो जाएगी
दोस्त के यहाँ खाना ठंडा हो जायेगा
वग़ैरह...
वक़्त की वजह से
क्योंकि अब वक़्त सबके साथ चल रहा है
क्या मुसीबत है
जब हम दोस्त के यहाँ जाते हैं
हमारी छाया साथ-साथ चलती है
वास्तव में वो छाया नहीं, वो वक़्त ख़ुद है
जो हम सबको बता रहा है
जल्दी करो, और जल्दी
या शायद, अब कुछ नहीं हो सकता
गाड़ी निकल गयी
पास की धर्मशाला में रुक जाओ
पर ज़रा जल्दी
वरना आख़िरी कमरा भी बिक जायेगा
छाया की लम्बाई हमें संकेत देती है
कि हमें क्या करना है
और किस गति से करना है
वक़्त दुनिया को चलाता है
हम सब लोगों के ज़रिये
दूसरा दृष्टिकोण
वक़्त की वजह से कई चीज़ें अपने आप भी होती जाती हैं
बोनस की तरह ऑटोमेटिक
अब वक़्त खाली तो बैठ नहीं सकता
रुक भी नहीं सकता
कुछ न कुछ तो करेगा ही बेचारा
आपकी उम्र बढ़ा देगा
कमज़ोरी बढ़ा देगा
बाल सफ़ेद कर देगा
ज़्यादा जोश आया तो बाल ... ग़ायब ही कर देगा
आवाज़ कमज़ोर कर देगा ...
पर ये सब कुछ ग़लत ही करता है
ऐसा भी नहीं है
ये बहुत कुछ सही भी करता है
आपका अनुभव और सहनशक्ति बढ़ाता है
बातचीत का तरीक़ा बेहतर कर देता है
सलीक़ा आ जाता है
वक़्त की वजह से शायद
आप सुर में गाने लगें
बेहतर लेखक बन जाएँ
ऐसी ही इधर-उधर की छोटी-मोटी वजहों से
शायद समाज में आपकी इज़्ज़त बढ़ जाये
घर में मिठाइयाँ आने लगें
हो सकता है आपको कोई पुरस्कार मिल जाये
गुरुवार, 24 नवंबर 2022
मेरी वाली दुनिया
कुछ दिन हुए एक ख़ून हो गया
एक लड़के ने अपनी गर्ल फ्रेंड को मार दिया
जी-जी पता है
ऐसे हज़ारों क़िस्से हो चुके हैं
कुछ प्रेम सम्बन्ध कुछ समय तक चलते हैं
कुछ ज़्यादा लम्बे भी चल जाते हैं
पर एक सीमा के बाद हर लड़की शादी चाहती है
अपना परिवार चाहती है
जो कि सही भी है
पर लड़का तैयार नहीं होता
ऐसे हालातों में विदाई देने की प्रथा बन चुकी है
वो... शादी से पहले वाली विदाई
जी ये सब भी सबको पता है
कोई नई बात नहीं है
बार-बार एक-सी कहानी पढ़-पढ़ के
आख़िर आदत पड़ ही गयी थी
कहानी वही होती है
सिर्फ़ कलाकारों के नाम अलग होते हैं
शहरों और गांवों के नाम भी अलग होते हैं
एक जैसे कथानक से फ़िल्में बोरिंग लगने लगती हैं
मुझे भी इस तरह के समाचारों से दर्द होना बंद हो गया था
आँसुंओं का बहना रुक गया था
पर ये... ये क़िस्सा तनिक हट के निकला
तनिक नहीं, काफी हट के
जिस तरह उस लड़की की विदाई हुई... तौबा !
क्या मैं किसी दूसरे जहान में पहुँच गया हूँ
क्या ये सब सिर्फ़ इसलिए किया गया क्योंकि मुझे दर्द नहीं होता था?
देखते देखते वक़्त कितना बदल गया!
दुनिया कितनी बदल गयी
इतनी दहशत ! इतनी आसानी से?
आप जो भी कहना चाहें, कहें
पर मैं अब इस दुनिया को नहीं पहचानता
इसे प्यार से अपना नहीं कह सकता
ये दुनिया भले किसी और की हो न हो
पर यक़ीनन ये मेरी वाली दुनिया नहीं रही
शनिवार, 8 अक्टूबर 2022
हिम्मत
मंगलवार, 2 अगस्त 2022
कौन हो ?
कौन हो भाई ?
इतने धीमे से आकर खड़े हो गए ...
हमारे पीछे
हमें तो ये भी नहीं पता कि
पुरुष हो या महिला
बड़े हो या अभी बच्चे ही हो
पर... जाने क्यों
तुम्हारे पैरों की आहट से
मन को एक अजीब सी शांति मिली है
जैसे सुकून की हवा एक झोंका मेरे कमरे में आ गया हो
और उसने मेरे पर्दों
मेरे बालों, मेरे पौधों
सबको एक नयी ताज़गी दे दी
नयी ख़ुशी दे दी
एक अरसा हो गया था
कि बिना मांगे, या ढूंढें
कुछ अच्छा मिल जाये
बताना चाहोगे, कौन हो तुम ?
डर नूतन से
ठीक है, ठीक है, माना । क्या माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...
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मैं कौन था और क्या बन गया हूँ पहले बेहतर था, या अब हूँ पहले कुछ था भी, या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ अगर कुछ था तो क्या था और अगर अब कुछ हूँ...
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मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग ह...








