सोमवार, 4 नवंबर 2024

ज़िन्दगी या मयकदा

घड़ी की सुइयां सवा बारह पर थीं
आधी रात हो चुकी थी
यानी मयकदे की शाम ढलने लगी थी
लोग कुछ अजीब तरह से हिलने-डुलने लगे थे
जैसे आलस और थकावट ने धर लिया हो
ज़्यादातर लोगों की आवाज़ें भी धीमी हो गई थीं
अब साकी की तरफ़ एक उंगली की बजाय
पूरी हथेली उठ रही थी
पीछे की मेज़ों का शोर ख़त्म हो चला था
एक साक़ी परदे के पीछे चली गयी थी
ख़ैर, कटोरी में बचे चने के आख़िरी दो दाने
मुंह में डालते हुए
मैंने दोनों हाथ घुटनों पर रखे
दीवार की घड़ी पर नज़र डाली
सही वक़्त है
उठने के लिए
सामने रखे नोटों और सिक्कों पर नज़र डाली
सही से थोड़े ज़्यादा लगे
मतलब सही थे
मेज़ का सहारा ले कर
मैं खड़ा हो गया
अब मुझे तीन क़दम सीधे चलना है
जितना हो सके सीधे   
फिर गल्ले के सामने से निकलते हुए दो क़दम बायें
ऐसे वक़्त पर ये हिसाब कर लेना चाहिए
वरना फ़जीहत हो सकती है   
दरवाज़े के बाहर निकलने से पहले
एक लम्हे के लिए मैं पीछे मुड़ा
सब चुपचाप बैठे थे
किसी ने मुझे न देखा न पहचाना
न ही मैंने किसी को
परदे के पीछे साकी अभी भी अपनी तश्तरी पर झुकी हुई थी
गल्ले पर बैठे आदमी का हिलता हाथ
सलाम जैसा लगा
मैं भी सलाम बुदबुदा दिया

शाम की शुरुआत में लोग ज़्यादा ख़ुश होते हैं
ऊंची आवाज़ में बातें करते हैं
चाल तेज़ होती है
प्याले भी जल्दी ख़त्म हो जाते हैं

एक शायराना-सा ख़याल ज़ेहन में पैदा हुआ
मयकदे की हर शाम को जो होता है 
वो इंसान की ज़िन्दगी का अक्स ही होता है
'दोस्त' उम्र के साथ जैसे वक़्त बदलता है
मयकदे की हर शाम का भी वही हश्र होता है

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

हमारी स्थिरता

धरती अपनी धुरी पर ४५० मीटर प्रति सेकंड की गति से घूम रही है 

धरती अपने सितारे सूर्य के चारों ओर ३० किलो मीटर प्रति सेकंड की गति से चक्कर लगा रही है 

सूर्य, पूरे सौरमंडल के साथ अपनी आकाश गंगा में २३० किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चल रहा है

और आकाश गंगा एक सेकंड में अपने अनगिनत तारों, ग्रहों, शायद डार्कमैटर इत्यादि के साथ ६०० किलो मीटर आगे निकल जाती है।


अब भी अगर किसी को लगता है की हम एक ही जगह पर खड़े हैं, तो उन्हें अपना विचार बदलने का अच्छा मौका है 








रविवार, 7 अप्रैल 2024

सच सिर्फ सच

मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग है कि मैं सोया नहीं हूँ। अगर बंद हैं तो सोया ही हूं, ऐसा भी पक्का नहीं है। हो सकता है मैं कुछ सोच रहा हूं, किसी बात या घटना की याद कर रहा हूं या सिर्फ़ आराम कर रहा हूं; इनमें से किसी एक की सम्भावना हो सकती है। आपने शायद अनुभव किया हो कि कई बार लोगों से बात करते-करते ऊँघ सी आने लगती है। बातें सुनी-अनसुनी लगने लगती हैं। ख़ास तौर पर बोरिंग लोगों के वही सुने-सुनाए समाचार, वही जानी-पहचानी खुशियां, परेशानियां।
दोपहर के इस वातावरण में सुबह की सुरीली चिड़ियाँ नहीं चहकतीं, कोई इक्का दुक्का कोयल सुनाई दे जाये, तो दे जाये। अधिकतर कौव्वों की ध्वनि ही सराउंड चॅनेल में तैर रही थी। यातायात भी लगभग कुछ नहीं के बराबर था। नगण्य। कदाचित 
इसे ही मनहूसियत कहते होंगे।
विचारों की इस उठा-पटक में मैंने कुछ बेहद अजीब और अलग तरह की आवाज़ सुनी। उस जैसी आवाज़ का घर के सामने वाली सड़क पर सुनाई पड़ना लगभग असम्भव था। पर ये आवाज़ तो घोड़े की टाप जैसी नहीं थी। टेलेविजन की साउंड डिज़ाइन में मैंने घोड़े के टापों के साथ काफी काम किया है। वो तो बिलकुल क्रिस्प होती है, क्लिप-क्लॉप जैसी। क्या बला है ये ? फिर लगा टापों की ध्वनि में कुछ घुंघरू जैसी आवाज़ें भी मिली हुई थीं। अब तो लगा कि ये घोड़ा मुझे खिड़की तक खींच कर ही मानेगा। मैंने ज़रा सा पर्दा हटा कर नीचे झांका।
देखा ना। मुझे पता था कि ये आवाज़ घोड़े की नहीं हो सकती थी। उस जानवर ने ज़ोर से अपना चेहरा दाएं-बाएं हिलाया। अब पता चला घुंघरुओं में पत्थरों की ध्वनि भी मिली हुई थी। अगर मैं इतनी नींद में ना होता तो मुझे ज़बरदस्त झटका लगा होता। नीचे,गेट के ठीक बाहर एक विशालकाय भैंसा खड़ा था। उसके गले में विभिन्न तरह की रंग-बिरंगी मालाएं थीं। बहुत सारी घंटियां भी थीं। माथे पर बड़ा सा लाल टीका था। सबसे बड़ा अचम्भा तो तब हुआ जब मैंने एक बेहद काले आदमी को उसकी पीठ पर सवारी करते देखा। नहीं मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा था, निश्चित, निश्चित।
मैंने बैल और गाय ले कर पैसे मांगने वाले लोग कई बार देखे हैं। पर ये आदमी तो भैंसे पर चढ़ा हुआ था। सब कुछ इतना चकित करने वाला था कि मेरा सामान्य ज्ञान इसे समझने में विफल हो गया। वो बेहद काले सज्जन भी अपने भैंसे की तरह ही सज्जित थे, कदाचित उससे अधिक। ख़ैर वो आहिस्ता से सरक कर अपनी सवारी से नीचे उतर गए। भैंसा फिर हिनहिनाया। उन सज्जन ने भैंसे की गर्दन को सहलाया और ऊपर की ओर देखा। मेरा पर्दा दो उंगली बराबर ही खुला होगा। पर उनकी ऊपर देखती नज़र को भांप कर मेरी सांस अटक गयी। मैंने पर्दा छोड़ दिया। कौव्वों की कैं-कें बढ़ गयी थी। शायद वो भैंसे से परेशान हो रहे थे। या शायद घंटियों और मालाओं की ध्वनि से। कुछ क्षणों के बाद मुझे लगा कि कोई भारी भरकम इंसान सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। वो नंगे पैर है पर उसका भार हर सीढ़ी पर सुनाई पड़ता है। उसके गले की मालाएं भी बहुत शोर कर रही थीं।

दरवाज़े पर एक बेहद भारी हाथ ने दस्तक दी। केवल एक दस्तक।

अगर मैं आलस और नींद में इस तरह सराबोर नहीं होता तो उस दस्तक की कर्कश ध्वनि से कूद के खड़ा हो जाता। पर इस समय समझ नहीं आया कि क्या किया जाए । दस्तक हुई है, तो आगंतुक के लिए दरवाज़ा खोलना तो बनता ही है। भारत में अतिथि-सत्कार का बड़ा महत्व है। राम-लल्ला का नाम लेते हुए मैंने दरवाज़े को छुआ। सोच-विचार में दो-तीन क्षण और बीत गए। इतने में एक दस्तक और हो गई। धम्म। इस बार मैं हिल गया। क्योंकि मैं दरवाज़े के करीब था।
संभलते हुए मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो अँधेरे सज्जन पूरी तरह दृश्यमान हुए। उनका आकर देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन को पूरी तरह नीचे से ऊपर लेना पड़ा। मैंने आदर पूर्वक नमस्कार किया। वो अपनी घनी काली मूछों के पीछे से मुस्कराये। मैं सामने से हट गया जिससे वो अंदर प्रवेश कर सकें। मैंने हाथ से इशारा किया और वो सोफे पर विराजमान हो गए। मैंने कहा 'जल लेकर आता हूं' । 'हं, धन्यवाद'। मैं जल्दी से कांच के गिलास में पानी लेकर आया। उन्होंने गिलास के आर-पार पानी को कौतूहल से देखा और दो घूँट में पूरा पी गए। मैंने पूछा 'और', उन्होंने भंवें सिकोड़ते हुए 'नहीं' सर हिला दिया। मैं गिलास को वापस रखने रसोई में गया तो वो जल्दी में खड़े हो गए थे। इससे पहले मैं उनके पधारने का प्रयोजन पूछूं, एक अजीब घटना हुई। घर को एक झटका सा लगा। भूकम्प जैसा। इससे पहले मैं कुछ सोचता एक के बाद एक कई झटके आ गए। घर के पंखे हिल रहे थे। फ्रिज भी एक तरफ को सरक गया था। ये काफी शक्तिशाली भूकंप था। डर से मैं दीवार को पकड़ कर खड़ा हो गया। मेरे मेहमान भी खड़े थे। उनकी भृकुटि तन गयी थी, और सिकुड़ भी गयी थी। वो अपनी बाहों को दोनों ओर फैला कर सुरक्षा की तलाश में थे। कुछ क्षणों में कड़ाके की आवाज़ के साथ छत में एक लम्बी दरार पड़ गयी। वहां रहने वाले पड़ोसियों की चीत्कारें सुनाई देने लगीं। कैसा भूचाल था ये? रुक ही नहीं रहा था। दीवारों का प्लास्टर भी उखड़ कर गिरने लगा। जल्दी ही छत और दीवारों के अनगिनत टुकड़े लगातार गिरने लगे।

अब एकाएक; वो अँधेरे सज्जन क्रियान्वित हुए। शांति से पहले उन्होंने पर्दा हटा कर नीचे अपनी सवारी को देखा। फिर मेरा हाथ पकड़ के मुझे खिड़की की तरफ़ ले गए। इसके बाद उन्होंने पूरी खिड़की को ही अपने स्थान से हटा दिया। वैसे ही जैसे मैंने पर्दा हटाया था। अगले क्षण मैं बाहर हवा में निकल चुका था। इससे पहले हम नीचे गिरते, उनकी सवारी ऊपर आ चुकी थी। भैंसे जी ये सब देख कर बिल्कुल प्रसन्न नहीं थे। हम दोनों उनकी विशाल पीठ पर विराज गए। कुछ समय तक हम तीनों उस भवन की विनाश-लीला देखते रहे। मेरे पडोसी चीख़ रहे थे। आने-जाने वाले सहायता में जुट रहे थे।

धीरे-धीरे भैंसे जी हम दोनों के साथ ऊपर उठने लगे। शोर कम होता गया। त्रासदी का असर भी कम हो रहा था। हवा थोड़ी ठंडी हो गयी। अब मेरे उस मेहमान ने अपनी जेब से एक बेशकीमती हीरे-मोती जड़े सुनहरे कपड़े का एक लम्बा सा सूची-पत्र बाहर निकाला। उसे ध्यान से परखा और उसके आरम्भ का एक भाग फाड़ कर फ़ेंक दिया। परन्तु वो टुकड़ा हवा में हमारे साथ ही तैरता, चलता रहा। अब उन्होंने आँखें बंद करके ध्यान लगाया और साथ-साथ कोई मन्त्र बुदबुदाया। इसके बाद उस कपड़े में आग लग गयी और कुछ क्षणों में वो राख बन कर बिखर गया।




शुक्रवार, 29 मार्च 2024

चलते चलते

चलते चलते 
एकाएक उसे लगा कि
उसकी दायीं हथेली पर
एक हल्कापन सा आ गया 
कुछ तो था जो कम हो गया
एक दबाव जो ग़ायब हो गया
उसने ध्यान नहीं दिया 
छोटी सी बात है, होगा कुछ 
पर उसका हाथ अब अधिक स्वच्छंद था 
वो आसानी से आगे पीछे हिल रहा था 
ये बात निश्चित रूप से ध्यान देने लायक थी 
हथेली में एक गर्मी सी रहा करती थी 
वो कम हो रही है 
अब वहां हवा लग रही थी 
और फिर ठंडक का एहसास होने लगा
कदाचित दो हथेलियों के बीच
पसीने की एक पर्त बन गयी होगी 
उसे याद आया
यदि द्रव का वाष्पीकरण हो तो 
तापमान कम होने लगता है 
इस कारण ठंडक पैदा हो रही थी 

माना कि हाथ छूट गया 
माना कि साथ छूट गया 
पर अब साथ है स्वच्छंदता 
और ठंडक की अनुभूति



भोजन का समय

अपनी ही धुन में अकेले अकेले
बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बुवाई और सिंचाई एक ओर
बच्चों का शोर दूसरी ओर

दूर से माँ की पुकार गुहार
लल्ला बाबूजी आएंगे अबकी बार
रामू, लल्ली, घनस्याम, बनवारी, राधा
हर बच्चा अपनी झोंपड़ी  की तरफ भागा
धुंए का एक बादल हर छप्पर पर बैठा था 
भोजन का समय हो चुका था
रोटी दाल और चावल की सुगंध से वातावरण भर गया था 
उधर सूरज लगातार पश्चिम की ओर झुक रहा था 
और पेड़ों की फुनगियों से नीचे सरकने लगा था
चिड़ियों के झुण्ड किरणों का ये इशारा समझ गए थे 
सब अपने-अपने घोसलों में लौट रहे थे 
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे 
भोजन का समय जो हो गया था
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था 
माँ बाप की चोंचों में तड़पते स्वादिष्ट कीड़े-मकोड़ों का 

















गुरुवार, 14 मार्च 2024

उसकी ट्रेन

वो प्लेटफॉर्म पर खड़ा था
साधारणतया जैसी या जितनी भीड़ होती है वैसी ही थी
भीड़ कम थी, या ज़्यादा थी
ये निर्भर करता है कि इसे कौन जांच रहा है
और वो कहाँ से आया है
 
वातावरण में ठक-ठक की आवाज़ हो रही थी
जो बूट-पॉलिश वाले खाली बैठे थे 
वो अपने-अपने डिब्बों को ठोक रहे थे
अब पॉलिश के ग्राहक काफी कम हो गए हैं
उसे पता था कि इसके अपराधी स्पोर्ट्स टाइप के जूते हैं
जिन्हें पॉलिश नहीं किया जाता...

चर्चगेट की ट्रेन आयी
उसके रुकने के काफी पहले ही हुजूम आगे बढ़ा
झिझकता हुआ वो भी बढ़ा
पर थोड़ा पीछे रहा
ट्रेन रुकी, पहले लटके हुए लोग 
लम्बी कूद लगा कर कूद पड़े
उनमे से कई, नीचे खड़े लोगों से टकरा गए 
अब अंदर दबे हुए लोग लावा की तरह बाहर उगले जा रहे थे
जैसे उन्हें अपने पर नियंत्रण ही नहीं था
प्लेटफॉर्म के लोग ट्रेन के अंदर जाने के लिए ऐसे लालायित थे
जैसे एक बंधा हुए भूखा कुत्ता सामने पड़ी हड्डी को देख रहा हो
उतरती भीड़ ने बहुत ज़ोर का शोर मचाया
युद्ध के आरम्भ की गर्जना जैसा 
जिसका मतलब था कि दूर रहो
हमारे उतरने में बाधा नहीं डालना ...

बिना कपड़े फटे या जेब कतरों के शिकार हुए,
ट्रेन से उतर जाने और चढ़ने को दिन की उपलब्धि कहा जा सकता है...
उसने सोचा चलो अगली बार सही
वो वापस उसी जगह पर खड़ा हो गया
जहां था 
उसके जैसे असफ़ल लोग
इंडिकेटर पर अगली ट्रेन का समय देखने लगे
ट्रेन ६ मिनट के बाद आने वाली थी
६ मिनट गुज़रने में समय ही कितना लगता है
दो या तीन मिनट, बस, इससे ज़्यादा नहीं
उसने सोचा   

बगल के प्लेटफॉर्म पर दूसरी तरफ जाने वाली ट्रेनें आ-जा रही थीं
यात्री भी एक तरह से उदासीन लग रहे थे
जैसे उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी...

अगली ट्रेन आई 
भीड़ फिर उसी तरह आगे बढ़ी
इस बार वो भीड़ का हिस्सा बिल्कुल नहीं बना
थोड़ा पीछे रहा
'ख़बरदार रहना' का शोर फिर से हुआ
पर उसने अनसुना कर दिया
इस बार  
ट्रेन के रुकने से पहले ही उसने एक डिब्बे के बायीं ओर
एक छोटा सा गैप देख लिया था
सही समय पर
अर्जुन जैसी एकाग्रता के साथ वो आगे बढ़ा
और जैसे कहते हैं ना, 'लाइक ए फ्लैश'
उस ज़रा सी खुली जगह में विलीन हो गया
ट्रेन चल पड़ी
वो भी और लोगों की तरह पहुंच ही जायेगा

तेज़ भागती ट्रेन के शोर में
अनजान लोगों के बीच दबे हुए हुए
उसे लगा कि
उसके मोबाइल पर एक मेसेज आया है
चलो शायद कोई तो सोच रहा है
उसके बारे में



शनिवार, 18 नवंबर 2023

सफ़ाई

आज ये ख़्याल आया
कि अगर किसी वजह से
आंसू बहने लग जाएँ
और आँखें साफ़ हो जाएँ
नज़र भी ठीक हो जाये
दिखने लग जाये कि 
दुनिया कैसी है
साफ़ सुथरी या मैली कुचैली
लोग कैसे हैं
कैसे चलते फिरते हैं
वो उचित व्यवहार कर रहे हैं,
या अनुचित, अथवा कदाचित निकृष्ट 
संसार में हिंसा कितनी है
किसी जगह पर किसी समय पर
प्रेम या अहिंसा भी नज़र आती है या नहीं
चलो इन सब पर तो मेरा नियंत्रण है नहीं
फिर भी और कुछ नहीं तो
दुनिया से मिले ग़मों के
तोहफ़े से मिले
आंसुओं ने
मेरी आँखें तो साफ़ कर दीं



रविवार, 29 अक्टूबर 2023

कुछ अनमोल पल

एहसास की रोशनी

एकाएक एक दिन

कर गयी रोशन 

इस दिल के कुछ ख़ाली अँधेरे खाने 

पुरानी बंद किताब के पन्ने 

काफी अजीब लगा 

बहुत सारी पुरानी चीज़ें,

चेहरे, लोग, बातचीत

एक नया शहर, नया घर, नया कमरा 

नई ज़िन्दगी, नई नौकरी, नई बेकारी

हाँ, नए परिवार में चंद पुराने दोस्तों ने माहौल बदल दिया 

हाथ मिलाना गले लगना शोर मचाना 

"अरे तुम भी ! यहाँ?  वाह मज़ा आ गया।"

इतना जाना पहचाना तहलका

जैसे बीच समुद्र एक हरा भरा द्वीप मिल गया हो 

मेहमान अभी कमरे के दरवाज़े पर ही था 

अंदर संदूक रखने का भी मौका नहीं मिला था 

शोर भी बंद नहीं हुआ था


उस परिवार के साधारण से लोग चारों ओर खड़े थे 

इस हंगामे के मज़े ले रहे थे 

भरा पूरा परिवार था 

बा थीं तीन बच्चे और मम्मी पापा 

कुछ मुस्करा रहे थे कुछ हंस रहे थे 

बा को ये सब पागलपन लग रहा था

एक लम्बी सी निक्कर पहने तुकाराम   

एक हाथ से अपनी हंसी छुपा रहा था 

इन सबसे अलग सफ़ेद फ्रॉक में एक बच्ची थी 

भावरहित चुप और शांत

उसका दांया कन्धा दीवार पर टिका था 

पर उसकी बड़ी-बड़ी गोल आँखें 

मेहमान पर टिकी थीं 

मेहमान ने एक सरसरी सी नज़र उस पर डाली 

और देखा कि

उसकी मासूम निगाहें उस पर ही टिकी थीं 

ये देख कर मेहमान ने उसे नमस्ते कह दिया 

उस बच्ची को ये पता नहीं था कि

किसी को लगातार इतनी देर तक देखना

मासूमियत की निशानी है

और मेहमान को ये पता नहीं था कि

अपनी ज़िन्दगी के इस बेहद नाज़ुक मोड़ पर

वो कितनी सही जगह आ गया है



बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

सलाह एक दोस्त की

मैं कौन था
और क्या बन गया हूँ
पहले बेहतर था, या अब हूँ
पहले कुछ था भी,
या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ
अगर कुछ था तो क्या था
और अगर अब कुछ हूँ तो क्या हूँ, कौन हूँ
पर बीच का वो समय
जब मैं कुछ से कुछ और में बदल रहा था
क्या मुझे उसके बारे में नहीं सोचना चाहिए?
वो भी आखिर मैं ही था
वो मेरे ही जीवन का समय था
हो सकता है वो समय ही बेहतर रहा हो
जब मैं बदलाव के तूफ़ानों से गुज़र रहा था
जी, बदलाव
ये शब्द कितना अर्थपूर्ण,
कितना पूर्ण लगता है
अगर चीज़ें बदल नहीं रही हैं
तो वो वास्तव में हैं ही नहीं
वो अस्तित्वहीन हैं
अर्थात शायद जब मैं 'कुछ' बन जाऊँगा
और फिर मेरा बदलना बंद हो जायेगा, 
उस समय निश्चित रूप से
मैं कुछ नहीं रह जाऊँगा
तब मैं समाप्त हो जाऊँगा 
मैं सांस लूँगा, मेरा दिल धड़केगा 
केवल उतना ही 
मेरा व्यक्तित्व समाप्त हो जायेगा 

इसलिए वो बनो
वो जीवन जिओ
जिसमें बदलते हुए समय के थपेड़े हों
उत्सुकता, व्याकुलता, चिंता, घबराहट
जीवन की ऐसी सारी सामान्य बातें
 
राह जीवन है 'दोस्त'
मंज़िल जीवन नहीं है
वो केवल एक पड़ाव है


सोमवार, 2 जनवरी 2023

क्या है वक़्त

कब शुरुआत हुई वक़्त की
क्या ये कहीं छुपा बैठा था
कि एकाएक साथ हो लिया
या ऊपर से टपक पड़ा
और सामने आ गया
वक़्त के पहले कोई ये नहीं सोचता था
कि देर हो गयी
या देर हो रही है
जल्दी चलना पड़ेगा
वरना अँधेरा हो जायेगा
दुकान बंद हो जाएगी
दोस्त के यहाँ खाना ठंडा हो जायेगा
वग़ैरह...
वक़्त की वजह से 
दुनिया भर के झंझट दुनिया के सामने आ गए
क्योंकि अब वक़्त सबके साथ चल रहा है
क्या मुसीबत है
जब हम दोस्त के यहाँ जाते हैं
हमारी छाया साथ-साथ चलती है
वास्तव में वो छाया नहीं, वो वक़्त ख़ुद है
जो हम सबको बता रहा है
जल्दी करो, और जल्दी
या शायद, अब कुछ नहीं हो सकता
गाड़ी निकल गयी
पास की धर्मशाला में रुक जाओ
पर ज़रा जल्दी
वरना आख़िरी कमरा भी बिक जायेगा
छाया की लम्बाई हमें संकेत देती है
कि हमें क्या करना है
और किस गति से करना है
वक़्त दुनिया को चलाता है
हम सब लोगों के ज़रिये

दूसरा दृष्टिकोण


वक़्त की वजह से कई चीज़ें अपने आप भी होती जाती हैं
बोनस की तरह ऑटोमेटिक
अब वक़्त खाली तो बैठ नहीं सकता
रुक भी नहीं सकता
कुछ न कुछ तो करेगा ही बेचारा
आपकी उम्र बढ़ा देगा
कमज़ोरी बढ़ा देगा
बाल सफ़ेद कर देगा
ज़्यादा जोश आया तो बाल ... ग़ायब ही कर देगा
आवाज़ कमज़ोर कर देगा ...
पर ये सब कुछ ग़लत ही करता है
ऐसा भी नहीं है
ये बहुत कुछ सही भी करता है
आपका अनुभव और सहनशक्ति बढ़ाता है
बातचीत का तरीक़ा बेहतर कर देता है
सलीक़ा आ जाता है
वक़्त की वजह से शायद
आप सुर में गाने लगें
बेहतर लेखक बन जाएँ
ऐसी ही इधर-उधर की छोटी-मोटी वजहों से
शायद समाज में आपकी इज़्ज़त बढ़ जाये
घर में  मिठाइयाँ आने लगें
हो सकता है आपको कोई पुरस्कार 
मिल जाये

ऐसे ही किसी वक़्त शायद
आप वक़्त को धन्यवाद भी दे दें। 




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...