रविवार, 8 अगस्त 2021

अरज है इतनी

अरज है इतनी
दरस दिखाओ
... यहाँ आओ या वहां आओ 
घर पे या बाहर ही आओ 
बताओ कब आओगे 
और फिर वादा निभाओ 
कितने दिन हो गए 
हाँ हाँ करते
यहाँ वहां करते 
आज नहीं कल करते 
अभी नहीं फिर कभी कहते 

ज़माने की फिकर है तुमको
तुमसे बहुत काम होगा सबको 
कभी मेरा भी कोई काम कर जाओ 
अब दोस्ती एक तरफ़ा तो नहीं हो सकती 
तुम्हारा नाम अच्छे लोगों में शामिल है 
क्योंकि तुम सबकी मदद करते हो 
पर क्योंकि उन सब में मैं शामिल नहीं हूँ 
इसलिए उन सबको 'सब' नहीं कहा जा सकता 
कभी सोचा है इसके बारे में 
शायद तुम बड़ा सोचते हो 
जहाँ सब शामिल हों वो बड़ा हो गया 
पर मुझे भी शामिल करने से 
वो कुछ ज़्यादा बड़ा हो जायेगा 
और तुम उसे संभाल नहीं पाओगे 
या मेरी वजह से उसकी कीमत कम हो जाएगी 

शायद मैं कुछ ज़यादा ही अक्ल लगा बैठा 
खैर फिर भी 
हो सके तो आओ
दरस दिखाओ 
अरज तो इतनी ही थी

शनिवार, 7 अगस्त 2021

जो था सो था

एक समय था
वो काफी पहले था
मैं अब जैसा हूँ वैसा नहीं था
बहुत छोटा था
छोटे तो सभी होते हैं
पहले जब वो होते हैं
उस वक़्त मुझे पता नहीं था
कि क्या पता होना चाहिए
तब धीरे धीरे पता चल रहा था
क्या ज़रूरी था
क्या नहीं था
क्या कुछ ऐसा था
जो उस वक़्त ज़रूरी था
पर बाद में नहीं होने वाला था
और बहुत कुछ ऐसा था
जो समझ में नहीं आता था
पर ज़रूरी लगता था
शायद बाद में उसकी ज़रुरत पड़ने वाली थी
पर पक्का नहीं था
कि किसी चीज़ की ज़रूरत बाद में पड़ेगी
कितनी बाद में
कुछ दिनों में महीनों में या बरसों में
इतना सोचना नहीं आता था

वक़्त ऐसे ही गुज़र रहा था
कई ग़ैर ज़रूरी चीज़ें
चंद ग़ैर ज़रूरी काम
ज़मीन पर बैठ कर सब जूतों के फीते खोलना
फिर डाल देना
कितना वक़्त होता था
पर मुझे पता ही नहीं था कि
मेरा दिल और दिमाग़ जो करना चाहता था
वो क्या था 
क्या हो सकता था
अगर वो सामने आता तो.. 
तो मैं उसे पहचान सकता था 
पर उस जैसा कुछ कहीं नहीं था
कोई बताने वाला भी नहीं था
मन में कोई नाराज़गी खिन्ननता या उदासी नहीं थी
मैं ख़ुश भी नहीं था

इसका आश्‍वासन भी मैं नहीं दे सकता 

सोमवार, 17 मई 2021

परेशां बुत

एक उम्र बिता कर
सारे रिश्ते भुला कर
अपना पराया गँवा कर
ज़िन्दगी आ गयी है
ऐसे मक़ाम पे
जहाँ न सुकून है न दर्द है
कभी सुकून है तो दर्द भी है
दोनों साथ साथ हैं
फर्क मिट गया है दोनों के बीच का
कभी सुकून दर्द 
की वजह होता है
तो कभी दर्द में सुकून 
छुपा होता है

सूरज ढ़लता और चढ़ता साथ साथ
सुबह और शाम साथ साथ
ख़बर नहीं वक़्त चल रहा है
या थमा हुआ है

मैं कहीं जा रहा था
या आ रहा था
या ऐसा कुछ हुआ ही नहीं
मैं कहीं गया ही नहीं
कहीं जाने वाला ही नहीं था
आना जाना सिर्फ एक ख़याल था
हर शख़्स 
एक बुत बना हुआ था 
भागने के अंदाज़ में
वक़्त थमा हुआ था
क़लम रुकी हुई थी
लफ़्ज़ों के इंतज़ार में

शनिवार, 15 मई 2021

कुछ खास नहीं

अरे! क्या हाल है दोस्त ?

बस, कुछ खास नहीं

किधर चले?

कहीं नहीं, बस यूँ ही

और कोई नयी ताज़ी ?

नहीं नहीं, कुछ खास नहीं

अच्छा, ये हाथ पे  क्या हुआ

कुछ नहीं, ऐसे ही

ये तो जले का निशान लगता है

हाँ असल में वो ...

घर में पकोड़े तुम बना रहे थे?

नहीं नहीं, बस ऐसे ही

उफ़, तेल काफी गरम रहा होगा हाथ फूल गया है 

असल में... आग से जला है

आग! कैसी आग?

चिंगारी

चिंगारी? घर में? आग लग गयी थी क्या?

नहीं, असल में पिता जी के दाह संस्कार में एक...

क्या! तुम्हारे फादर गुज़र गए ?

हाँ... वो तीन दिन हुए

ओहो तो ये निशान चिता की आग से?

हाँ हाँ वहीं से, मुझे ही करना था सब कुछ

सॉरी यार... तो क्या बीमार थे ?

नहीं... सिर्फ बूढ़े थे, नब्बे साल के

अरे वाह तब तो पूरी ज़िन्दगी जी लिए ऐसा कह सकते हैं

हाँ, कह भी सकते हैं

बीमार रहे? आख़ीर में?

नहीं कुछ खास नहीं, सिर्फ एक महीना

वाह वाह, जीना हो तो ऐसा

हाँ शायद 

अम्म, उनको डेफिनिटली मिस कर रहे होगे?

हम्म... अभी तो कुछ खास नहीं

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मैं: तब और अब

जहाँ जहाँ जाना था हो आए हैं
जिन जिन से मिलना था मिल आये हैं
अब आ गए हैं अपने घर दोस्त
ख़ुद से गुफ़्तगू के लिए

तो बैठ गए हम अपने सामने
आमने सामने
और कस ली है कमर
दोनों ने
हिसाब किताब के लिए
बचपन से अब तक क्या मिला
कितना मिला
उसको मैंने कितना बढ़ाया,
गंवाया, कितना बनाया
कितना संवारा, निखारा

पर बचपन में क्या मिला ?
बचपन तक तो मिला नहीं
बचपन में बच्चे कैसे सोचते हैं
क्या करते हैं
क्या उनकी कोई इच्छा होती है
कितना दौड़ते भागते हैं
कूद फांद करते हैं
पार्क में, झूलों पर
अनजाने दोस्तों के बीच
अनजानी ख़ुशियों में डूबे
क्या वो सब था कहीं?
मुझे तो सिर्फ याद है
यहाँ बैठ जाओ
ये खा लो, इसको हाथ मत लगाओ
देखो टूट न जाये

अगर हर चीज़ से डरना पड़ा
सुन्दर चीज़ों से दूर रहना पड़ा
तो मुझे क्या मिला
डर ? और लालच ?
डर और लालच का मैं क्या बना सकता था
ज़्यादा डर और ज़्यादा लालच ?
शायद यही
या तुम्हारे पास कोई दूसरा तर्क है ?
नहीं ना
अजीब बात है
मैंने कई लोगों को ये कहते सुना था
ये बच्चा बड़ा बुद्धिमान है
चार साल की आयु में पूरी हनुमान चालीसा याद कर ली !
और भी बहुत कुछ...
चलो आगे बढ़ते हैं
कॉलेज की बात करें

नहीं, रुको
पहले ये देखो की आज तुम्हारे पास क्या क्या है
कई मज़बूत चीज़ें हैं
घर है नाम है परिवार है
हुनर है ..

एक मिनट
पर ये सब मुझे दिया किसने
तुमने ? बिलकुल नहीं
ये सब मेरी मेहनत, बुद्धिमत्ता और लगन का नतीजा है
मेरे साथ कोई नहीं था
पहले तो जनाब
ये सारे इरादे मैंने अपने अंदर पैदा किये
और फिर उन इरादों को इन तमाम चीज़ों में तबदील किया
किसी को कुछ पता नहीं था
कि मैं क्या चाहता हूँ
क्या सोचता हूँ
क्या सोच रहा हूँ 

मन में कुछ है भी या बस सर झुकाये काम किये जा रहा हूँ
मैं बिलकुल अकेला था
जब मेरे अंदर लगातार ये सारा मंथन चल रहा था
बरसों तक मंथन, मंथन, मंथन
फिर उस मंथन से धीरे धीरे सुनहरी चीज़ें बाहर आने लगीं
धीरे धीरे उन सुंदर चीज़ों से एक नयी दुनिया बनने लगी

तुम्हें मालूम था कि वो सब क्या हो रहा था?
तुम तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकते थे
सब बकवास, यही ना
बचपन का वो डर अब विश्वास में ढल चुका था
मैंने अपने विश्वास के सहारे
नए लोग ढूंढे
सुन्दर, प्यारे, निश्चिन्त
जिनके चेहरे पर मुस्कान रहती थी
तनाव नहीं
ये समझ लो कि नए रिश्ते बनाये
जल्द ही वो सब जो मुझे बचपन में मिलना चाहिए था
मैंने जवानी में हासिल किया
दोस्ती स्नेह आत्मविश्वास और भी बहुत कुछ
ख़ुद, अकेले
मैं शायद फिर से बच्चा बन रहा था

पर तुम्हें मेरी ये सफलता फूटी आँखों नहीं भाई
तुम्हारी सोच इतनी पुरानी है
कि, कि... तुम्हें सोचना ही नहीं चाहिए
कुछ भी नहीं
सोचना तुम्हारा काम नहीं है
लोग बाहर जा कर काम करते हैं
नाम कमाते हैं धन अर्जित करते हैं
दोस्त बनाते हैं
ये सब तुम्हारे बस का नहीं है
तुम्हें तो बस दिमाग लगाए बग़ैर ही जैसे मिलता रहा है
वैसे ही मिलता रहे...
तुमने कोल्हू देखा है?
मैंने देखा है
एक बैल छोटी सी अँधेरी कोठरी में चक्कर लगाता रहता है
घूमता रहता है, घूमता रहता है
गोल गोल गोल
उसको पता ही नहीं होता कि वो सरसों का तेल निकाल रहा है
सरसों कितनी बड़ी होती है पता है ?
इत्ती सी होती है  
तुम वैसे ही हो कोल्हू के उस बैल जैसे
पहली बात तो तुम कुछ नया कर ही नहीं सकते
अगर कुछ कर भी रहे हो तो तुम्हें पता ही नहीं होगा
कि तुमने कुछ किया भी है
दुःखद

ख़ैर; ठीक है मैं वापस ज़रूर आया हूँ
पर वापस आ नहीं गया हूँ
मैं वापस बाहर जाने के लिए ही आया हूँ
तुम्हारे साथ मेरा दम घुटता है
मुझे बाहर के बुद्धिमान दुश्मन मंज़ूर हैं
पर घर में छुपे सुरक्षित बेअक्ल दोस्त नहीं

मंगलवार, 23 मार्च 2021

एक बिचारा असंभव विचार

आप सब लोग आये
बेहद ख़ुशी हुई
इतने सारे जान पहचान के लोग एक साथ !
पर क्षमा करें
मैं आपके स्वागत में उठ नहीं सकता
हाथ नहीं मिला सकता
नमस्कार नहीं कर सकता
चलिए छोड़िए इस मुद्दे को
जी आप यहाँ इस तरफ की कुर्सी पर बैठ जाइये
और आप उस तरफ ... दरी पर जगह है
बच्चे तो ठीक ही हैं
पानी बरामदे में लगा है
आप शायद बैठना नहीं चाहते
कोई बात नहीं आप जैसा मुनासिब समझें

कहते हैं सबसे मिल कर दुख कम हो जाता है
शायद बंट जाता है
पर यहाँ तो लोग आपस में मिल कर और भी रो रहे हैं
ये ज़रूर है कि थोड़ी देर के बाद घर की बातें
बच्चों के किस्से
ऑफिस की गपशप आड़े आ जाती है
तो माहॉल हल्का होने लगता है
और थोड़ी देर में ठहाके भी सुनाई पड़ते हैं
पर ज़रा दबे-दबे, नज़रें बचा के

मैं सही हूँ
या नहीं
पता नहीं
शायद वैसे मुझे सोचने का हक़ नहीं है
मैंने वो हक़ खो दिया है
ये सत्य है कि
चलना बैठना बोलना भागना
अब मेरे लिये नहीं है
क्योंकि वो सब भौतिक हैं
परन्तु विचार का तो कोई रूप नहीं है
वो तो मन है
कहीं भी जा सकता है
कुछ भी कर सकता है
सबको छू सकता है
किसी चेहरे 
के इर्दगिर्द मंडरा सकता है
कहाँ चाय बन रही है देख सकता है
कौन रो रहा है
कौन कितना रो रहा है
किसको कितना दुःख है...

वर्षों से एक ख़्याल मुझे गुदगुदाता रहा है...
"काश मैं अपनी मौत के बारे लिख पाऊं"





रविवार, 18 अक्टूबर 2020

कहानी, एक पुरानी

नमस्कार महोदय

नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने। 

जी मैं एक दूत हूँ। दो कोस दूर नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ। 

इतनी दूर से? जी कहिये। 

जी गौतम से काम था. वो घर में हैं क्या ?

गौतम? जी नहीं वो तो अभी नहीं हैं। 

ये कहते हुए गौतम के चेहरे पर चिंता सी उभर आयी थी। 

जी अच्छा... जी, तो कब तक आ जायेंगे वो ? 

मैं क्या कह सकता हूँ ? वो अपनी इच्छा के अनुसार आते-जाते हैं। किसी को कुछ नहीं कहते। हो सकता है अभी प्रगट हो जाएँ। या तीन दिन तक दृषिगोचर न हों। पर आप आने का प्रयोजन तो बता ही सकते हैं। मैं गौतम से कह दूंगा। 

वैसे तो मुझे कठोर निर्देश है की इस विषय पर किसी से कोई चर्चा न करूँ, परन्तु क्योंकि आप कदाचित गौतम के साथ रहते हैं मैं आपको ये सन्देश दे देता हूँ। 

जी कृपा होगी।  गौतम को भी इस सन्देश पर कोई कार्य करना हो तो समय व्यर्थ नहीं होगा। 

जी उनसे कहिये कि देवांगना जिवानी, नगर की धर्मशाला में कुछ दिनों के लिए आयी हैं। यदि सम्भव हो तो श्री गौतम से मिलने की इच्छा रखती हैं। 

देवांगना जिवानी स्वयं! आप तनिक विराजें मैं कुछ फल काट कर अभी प्रस्तुत करूंगा। 

जी नहीं। आप कष्ट न करें। 

जी कदापि नहीं, इसमें कष्ट... किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। आप इतनी दूर से (बाहर झांकते हुए और कोई अश्व न देख कर) पैदल ही आये हैं। केवल पांच क्षण लगेंगे (एक हलकी सी मुस्कान के साथ) 

अंदर के कक्ष में चार-पांच क्षणों में गौतम के चेहरे पर कई भाव आये और गए। क्या अपनी पहचान छुपा कर गौतम ने बिना कारण एक असत्य अपने ऊपर ओढ़ लिया। 

असत्य... कई वर्ष पहले एक असत्य ने ही उसकी राह में कितने कांटे बो दिए थे। विवाह के समय ही वो जिवानी को मिला था और एक छोटी सी अवधि में ही वो दोनों प्रेम के अथाह सागर में डूब गए थे। उधर उसके पिता माता गौतम से परामर्श किये बिना राज्य के एक धनाढ्य व्यापारी की सुपुत्री को अपनी बहू बनाने का वचन दे चुके थे। गौतम को जब से भान है उसने सदैव अपने माता पिता के हर वचन का पालन किया था। किंचित इच्छा न रहते हुए भी उसने अस्त्र-शस्त्र विद्या का ज्ञान अर्जित किया, अश्वारोहण में निपुण हो गया, तथा वो युद्ध की जटिलता एवं गूढ़ता का भी विशेषज्ञ बन गया था। पर इस विवाह को सिर झुका कर स्वीकार करना उसके लिए अत्यंत कठोर चुनौती बन गया था। 

पीतल की थाली में कटे हुए सेब तथा छीले हुए संतरे ले कर गौतम बाहर आया।  क्षमा करें कदाचित तनिक विलम्ब हो गया। आप ग्रहण करें मैं जल ले कर अभी उपस्थित हुआ। 

अब आप तो मुझे लज्जित कर रहे हैं। 

कदापि नहीं। आप ग्रहण करें। 

जी। 

आपसे एक क्षमा याचना करनी है। 

जी ! ऐसा क्या घट गया ?

देव मैंने किसी पर्याप्त कारण के बिना आपसे एक असत्य कह दिया। 

असत्य ? कैसा असत्य ?

जी गौतम के विषय में। 

ओहो तो क्या गौतम यहाँ नहीं विराजते? मेरा अत्यंत मूल्यवान समय व्यर्थ हो गया। 

नहीं नहीं ऐसा कदापि नहीं है।  जी वास्तव में गौतम आपके समक्ष उपस्थित है। 

जी?

जी क्षमा करें सेवक ही गौतम है। 

परन्तु आपने ऐसा किस कारणवश ..?

चलिए इसका भेद मैं राह में खोलूँगा, राह भी कट जाएगी 

फल ग्रहण करने के उपरांत दोनों द्धार के बाहर निकले।  गौतम ने किसीको रक्षक के नाम से बुलाया। एक श्वान उठ कर आया। गौतम ने कहा, "तनिक ध्यान रखो हम संध्या-काल तक आएंगे। ये लो कुछ फल हैं। मित्रों के साथ मिल बाँट के ग्रहण करना।" श्वान खुले हुए द्वार के समक्ष बैठ गया। 

राह में कुछ क्षणों पश्चात् गौतम ने आगंतुक से अपने परिचय का अनुरोध किया। 

आनंद।  पिताजी ने नामकरण किया था, आनंद अरुण।  

ये तो अत्यंत दुर्लभ नाम है। एक ओर आनंद तथा उसके समकक्ष सूर्य। इस नाम की कोई तुलना नहीं हो सकती। 

आनंद के मुख पर एक नन्ही सी मुस्कान बिखर गयी, अपने नाम पर परन्तु उससे अधिक अपने पिता की प्रशंसा से।

मेरे पिता शास्त्रों के पंडित थे तथा लेखक भी थे। इसी वर्ष माघ के माह में उन्होंने मोक्ष ले लिया। 

मुझे खेद है आनंद। 

नहीं कोई बात नहीं। अंतिम समय में उनके चेहरे पर संतोष एवं स्नेह था। 

इस प्रकार का प्रयाण तो ऋषियों को ही प्राप्त होता है।   

आप अत्यंत उदार हृदय हैं। 

तो कहिये देवी जिवानी का मुझसे क्या प्रयोजन हो सकता है, गौतम ने कुरेदा। 

इस प्रश्न का उत्तर तो मेरे लिए दुष्कर है। उनके विषय में यदि मैं कुछ भी कहूँ तथा आप उसका कोई भिन्न अर्थ निकालें तो ये मेरे लिए भीषण समस्या हो जाएगी।  

कोई समस्या नहीं होगी। कहो। क्षमा... 'कहिये'। 

आनंद ने विनम्रता पूर्वक कहा, जी निन्दित न करें। मैं आयु तथा ज्ञान में आपसे बहुत पीछे हूँ। आप मुझे त्वम् या तुम कह सकते हैं

गौतम ने आनंद के कंधे पर हथेली रख दी

आनंद ने प्रारम्भ किया, मैं देवी के सान्निध्य में वर्षों से रहा हूँ। वे सदैव हंसमुख स्वाभाव की महिला रही हैं। परन्तु विगत चंद माह से वो किसी विचार में लुप्त रहने लगी हैं। मैंने एक बार जानने का प्रयत्न किया था, परन्तु इसका रहस्य वो मुझे कदापि उजागर नहीं करेंगी । मैं उनका इतना घनिष्ठ नहीं हूँ।  

हम्म ... तो तुम इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँच गए कि वो इस रहस्य का अनावरण मेरे समक्ष कर देंगी?

आपका ये प्रश्न पूर्णतया उचित है परन्तु मेरे लिए इसका उत्तर इतना भी सरल नहीं है। कदाचित मुझे नदी के किनारे-किनारे चलते हुए आपको अनेकों कहानियां सुनानी पड़ेंगी। 

मैं सुनने के लिए तत्पर हूँ। 


आदरणीय गौतम मेरा विचार है हम कुछ समय इस झरने के समीप उस समतल सी शिला पर विराज लें। तनिक विश्राम के साथ जल ग्रहण करें, हस्त एवं मुख प्रक्षालन भी। फिर भी यदि मुझे देवी की समस्याओं का उचित वर्णन करने में और भी अधिक समय लगा, तो एक धर्मशाला यहाँ से केवल आधे कोस पर ही है। 

मैं तुम्हारी योजना की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। तो कहो।

(शेष फिर कभी)

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

न कारवां है न ग़ुबार है

मैं भी अपने नये-नये दिनों में
जुड़ा था एक, कारवाँ से 
मेरे लिए वो पहला ही कारवाँ था 
मैं जुड़ा था जिससे
जब मैंने उसे नज़दीक से देखा
तो मैं उसे देखता ही रह गया था 
वो इतना बड़ा, इतना ऊंचा और इतना सुंदर था
सुना वो कई मंज़िलें तय कर चुका था 
उस वक़्त मैंने सोचा था 
कि मेरे जैसे आम इंसान को ये कैसे देखेगा  
कैसे देख सकेगा 
इतने ऊंचे और बड़े कारवाँ को 
मैं दिखाई भी दूंगा या नहीं ...

मैं घर आ गया 
पर... अगले दिन फिर वहां गया 
उस कारवां के इर्द-गिर्द घूमा 
फिर एकाएक ऐसा लगा
कि शायद मैं इसको,
या इसकी किसी चीज़ को, 
बचपन से जनता हूँ 
पहचानता हूँ 
आज कारवां की खुशबू भी अच्छी थी
कहीं से संगीत सुनाई दे रहा था  
शायद कोई गा रहा था 
हर कोई किसी न किसी काम में मस्त था 
ख़ुश था 
खिड़की से किसी ने हाथ हिलाया 
फिर अंदर बुलाया 
पानी पिलाया चाय भी पिलाई 
अब तो मुझे वो सब सीधे-सादे ही लगे 
काफी कुछ मेरे जैसे 
एक ने कहा कहाँ रहते हो 
मैंने कुछ कहा 
तो उसने कहा, यहीं रह जाओ 
मैं मुस्कराया और सोचने लगा  
अरे हम लोग हमेशा एक नयी मंज़िल की तरफ चलते हैं
नए शहरों नए घरों में रहते हैं 
नए-नए घर बनाते हैं  
नए गीत बनाते और गाते हैं 
ये बात मुझे बेहद पसंद आयी 
तुम भी हमारे साथ कई मंज़िलें देख सकते हो  
मेरे भी वो दिन थे 
वो वाले दिन, जब जोश होता है 
हिम्मत होती है 
और ऐसे कारवाँ 
दुनिया में कम ही होते हैं 
अगले ही दिन 
मैं अपनी पोटली ले कर वहां पहुँच गया ...
वो मेरा इंतज़ार ही कर रहे थे 
ये देख कर बेहद अच्छा लगा 

फिर मुझे याद नहीं
हमने कितनी मंज़िलें पार कीं 
कहीं रुके या 
बिना रुके ही बढ़ते गए 
बढ़ते गए ...

ख़ैर जनाब वक़्त बदलता है 
चीज़ें बदलती हैं 
सुंदरता कम हो जाती है 
चाल धीमी हो जाती है 
नयी मंज़िलों की ख़्वाहिश भी कम हो जाती है 
कारवां भी रुक रुक के चलता है 
कई लोग दूसरे कारवां ढूंढने लगे थे  
अब मैं भी उसे कुछ दूर से देख रहा था 
उसकी शक्ल अलग सी हो गयी थी 
वो भी मुझे पहचानने, समझने की कोशिश कर रहे थे 
मेरे भाव पढ़ रहे थे

मुझे याद है जब ये कारवां चलता था 
तो कितना ढेर सारा ग़ुबार उठता था 
और कितना ऊंचा जाता था 
उस ग़ुबार का भी एक नशा था 

कहते हैं, "मैं अकेला ही चला था 
जानिबे मंज़िल मगर 
लोग साथ आते गए कारवां बनता गया"...

अब मैंने इस ख़्याल का उल्टा प्लैबैक होता देखा है 
'दोस्त' साथ छोड़ते गए 
कारवां गुम होता गया
अब न तो वो कारवां है 
न ही कोई ग़ुबार ...




गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

लेखक - पागलपन

"ठीक है। मैं जा रहा हूँ नहाने। अब तब तक मुंह नहीं दिखाऊंगा जब तक पूरी तरह साफ़ सुथरा ना बन जाऊं। कसम खा ली है। भूल चूक माफ़। समझ लो अब तो दीवाना निकल पड़ा है कमर में तौलिया बाँध कर। मुझे रोकने के बारे में तो सोचना भी मत। पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं है। मैंने पूरी सफाई करने की ठान ली है। खुद की सफाई को हम हरगिज़ भुला सकते नहीं, ठन्डे पानी से नहा सकते हैं लेकिन वापस आ सकते नहीं। "

***

वो तौलिया बांधे वापस लौटा।

"मैं आ गया।  कहाँ हो भई ?" वो आई और मुझे अजीब नज़रों से देखा। 

"कौन हैं आप "

"अरे मैं ! याद नहीं ये तौलिया ? इसी में तो मैं गया था। "

"माफ़ कीजिये शायद आपसे भूल हुई है। वो तो इतने साफ़ कभी नहीं दिखते। आप पड़ोसी की घंटी बजा कर पूछ लीजिये अगर वो आपको पहचानते हैं।"

"क्या ग़ज़ब कर रही हो मैं उनसे क्यों पूछूं ? अरे रुको।  ये मैं ही हूँ। ये देखो कंधे पर ये निशान।"


"अरे ऐसे निशान तो कितनो के देखे मैंने।"

"क्या कहा? कितनो के !"

"हाँ वही तो कहा मैंने।"

"अच्छा सुनो सुनो, तुम्हें याद है जब हमने एक फिल्म देखने का प्लान बनाया था पर जा नहीं पाए। याद आया? और फिर पिछले महीने हम महाबलेश्वर जाने वाले थे पर टिकट नहीं मिले। ये सारी प्यार भरी बातें तुम्हें बिलकुल याद नहीं ?"

"क्या तुम उस मराठी कॉमेडी फिल्म की बात कर रहे हो जो हम देख नहीं पाए ?"

"हाँ हाँ वोही। वही हूँ मैं। क्या यार तुमने तो टेंशन में डाल दिया था। अरे ठीक है अब रोओ मत। ग़लती इंसान से ही होती है।  जो हुआ सो हुआ।  देखो न कितने आंसू बहा दिये। आओ इस तौलिये से पोंछ दूँ।"

"क्या!! तौलिये से, नहीं नहीं रहने दो , मैं टिशू ले लूंगी।"

लेखक

"साब आज इधर वाली टेबल ले लीजिये"

"ठीक है... कोई ख़ास आने वाला है क्या ?"

"अरे वही मालिक के रिश्तेदार... फिर से"

"कोई बात नहीं, ज़रा वो ऐश ट्रे दे देना  

पानी थोड़ा दूर ही रखो 

कहीं हाथ लग गया तो इस कंप्यूटर की मौत समझो

और इसकी मौत से पता नहीं कितनी ज़िंदगियाँ उलझी हुई हैं

नहीं कुछ पूछना मत

मतलब चाय कॉफी के लिए

मैं ही बुला लूँगा

ये पंखा कितनी आवाज़ करने लगा है ना आजकल

इसमें थोड़ा तेल डालने की ज़रुरत है

देखो न कितनी खचर खचर कर रहा है

अब ऐसे में रोमांटिक मूड बने तो कैसे बने

कल हीरो ने लड़की को पिक्चर के लिए राज़ी कर लिया था

इतने इस पंखे के शोर में तो दोनों को मोटर बोट में भेजना पड़ेगा

खचर खचर खचर खचर

चलो यार चाय ही ले आओ

और सुनो... वो समोसे, कबके ताज़े हैं?

अगर परसों तक के हैं तो एक ले आओ

दो हरी मिर्चों के साथ 

और अपना वो पीले रंग का टोमेटो सॉस मत भूलना

चाय मक्खी के बग़ैर हो तो बेहतर होगा

अरे सुनो सुनो... इतनी जल्दी भी क्या है

जब तक चाय ठंडी होती है न्यूज़ पेपर दे जाओ

... भई वाह आज तो चाय खासी गरम है

ये लो एक बेहद ज़रूरी बात तो हम भूल ही गए

बाहर हमारी साइकिल खड़ी है

उसपे नज़र मारते रहना

हाँ अब मन को शांति मिली

टपरी के कोने पे हीरो हेरोइन एक कटिंग चाय आपस में शेयर कर रहे हैं

अब 'दोस्त' इतने झंझट में रोमांटिक सीन 

इससे ज़्यादा रोमांटिक नहीं हो सकता

क्या ख़याल है आपका

ये दुनिया जो हम देखते हैं

लोगों को आते जाते

खाते पीते झगड़ते बतियाते

कुत्ते बिल्लियां चूहे छछूंदर

गौरैय्या बुलबुल कौव्वे कबूतर 

आसमान में उड़ते चील, बाज़

उड़ती पतंग हवाई जहाज़

समंदर तालाब नदी नाले

लिखने वाला पढ़ने वाले ...

किसीने कहा ये सब मिथ्या है

है कुछ नहीं, बस हमने सोच लिया है

अगर मेरी कल्पना में नाव कभी आयी नहीं

तो आंखें उसे देख न पाएंगी कभी...

तुम मेरे सामने हो या मेरे ख़याल में हो

या मेरे ख़यालों की वजह से सामने हो

मैं भी शायद एक ख़्याल हूँ  

पर मैं जैसा हूँ वो अपने ख़्याल से हूँ...

क्या तुमने मुझे जैसा सोचा था, वैसा मैं हूँ?

अगर नहीं तो तुम मेरे बारे में अपने ख़्याल बदल के मुझे बदल दो 

मैं भी शायद अपने ख़्याल बदल के तुमको बदल दूंगा

हर एक का अपना ख़्याल है, अपनी दुनिया है


आख़ीर में 
ग़नीमत है 'दोस्त' ये दुनिया, ख़्याली दुनिया है




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...