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शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

न कारवां है न ग़ुबार है

मैं भी अपने नये-नये दिनों में
जुड़ा था एक, कारवाँ से 
मेरे लिए वो पहला ही कारवाँ था 
मैं जुड़ा था जिससे
जब मैंने उसे नज़दीक से देखा
तो मैं उसे देखता ही रह गया था 
वो इतना बड़ा, इतना ऊंचा और इतना सुंदर था
सुना वो कई मंज़िलें तय कर चुका था 
उस वक़्त मैंने सोचा था 
कि मेरे जैसे आम इंसान को ये कैसे देखेगा  
कैसे देख सकेगा 
इतने ऊंचे और बड़े कारवाँ को 
मैं दिखाई भी दूंगा या नहीं ...

मैं घर आ गया 
पर... अगले दिन फिर वहां गया 
उस कारवां के इर्द-गिर्द घूमा 
फिर एकाएक ऐसा लगा
कि शायद मैं इसको,
या इसकी किसी चीज़ को, 
बचपन से जनता हूँ 
पहचानता हूँ 
आज कारवां की खुशबू भी अच्छी थी
कहीं से संगीत सुनाई दे रहा था  
शायद कोई गा रहा था 
हर कोई किसी न किसी काम में मस्त था 
ख़ुश था 
खिड़की से किसी ने हाथ हिलाया 
फिर अंदर बुलाया 
पानी पिलाया चाय भी पिलाई 
अब तो मुझे वो सब सीधे-सादे ही लगे 
काफी कुछ मेरे जैसे 
एक ने कहा कहाँ रहते हो 
मैंने कुछ कहा 
तो उसने कहा, यहीं रह जाओ 
मैं मुस्कराया और सोचने लगा  
अरे हम लोग हमेशा एक नयी मंज़िल की तरफ चलते हैं
नए शहरों नए घरों में रहते हैं 
नए-नए घर बनाते हैं  
नए गीत बनाते और गाते हैं 
ये बात मुझे बेहद पसंद आयी 
तुम भी हमारे साथ कई मंज़िलें देख सकते हो  
मेरे भी वो दिन थे 
वो वाले दिन, जब जोश होता है 
हिम्मत होती है 
और ऐसे कारवाँ 
दुनिया में कम ही होते हैं 
अगले ही दिन 
मैं अपनी पोटली ले कर वहां पहुँच गया ...
वो मेरा इंतज़ार ही कर रहे थे 
ये देख कर बेहद अच्छा लगा 

फिर मुझे याद नहीं
हमने कितनी मंज़िलें पार कीं 
कहीं रुके या 
बिना रुके ही बढ़ते गए 
बढ़ते गए ...

ख़ैर जनाब वक़्त बदलता है 
चीज़ें बदलती हैं 
सुंदरता कम हो जाती है 
चाल धीमी हो जाती है 
नयी मंज़िलों की ख़्वाहिश भी कम हो जाती है 
कारवां भी रुक रुक के चलता है 
कई लोग दूसरे कारवां ढूंढने लगे थे  
अब मैं भी उसे कुछ दूर से देख रहा था 
उसकी शक्ल अलग सी हो गयी थी 
वो भी मुझे पहचानने, समझने की कोशिश कर रहे थे 
मेरे भाव पढ़ रहे थे

मुझे याद है जब ये कारवां चलता था 
तो कितना ढेर सारा ग़ुबार उठता था 
और कितना ऊंचा जाता था 
उस ग़ुबार का भी एक नशा था 

कहते हैं, "मैं अकेला ही चला था 
जानिबे मंज़िल मगर 
लोग साथ आते गए कारवां बनता गया"...

अब मैंने इस ख़्याल का उल्टा प्लैबैक होता देखा है 
'दोस्त' साथ छोड़ते गए 
कारवां गुम होता गया
अब न तो वो कारवां है 
न ही कोई ग़ुबार ...




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...