इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा ?
और कोई दिखाई क्यूँ नहीं देता
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ
और बाकी दुनिया? वो कहाँ है
दुनिया वाले कहाँ हैं
वो सब लोग...
लाखों करोड़ों
क्या कोई बम फट गया
या कोई भयानक आग लग गयी
पर... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही
धुआं... वो भी नहीं
ये... ये क्या जगह है
कौन सा शहर है
ये सड़क है या कोई वीराना
किसी का कोई घर
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की
हवा का कोई झोंका
उफ़... क्या मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ
एका-एक घुप्प अँधेरे में
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा
...ओह तो मेरे जैसा एक और भी है
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला
पर मन में डर भी था
पता नहीं कौन...
दोस्त या कोई और
पर अँधेरे के उस टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया
फिर रुक गया
फिर चला फिर रुक गया
फिर चला...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी
मुझे लगा ये दोस्त हो या ना हो
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है
धीरे धीरे वो साया मेरे बिल्कुल पीछे आ गया
मैं ज़रा डरा, हिचकिचाया
तो वो भी वहीं रुक ही गया
फिर... कुछ बेहद अविस्वशनीय हो गया
मेरे कंधे पर एक हाथ आया
मैं सन्न रह गया
पीछे मुड़ न सका
दो तरह के डर मन में लबालब भरे हुए थे
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना असम्भव होगा
... ये कोई अनजाना दुश्मन न हो
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया





