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बुधवार, 22 मार्च 2017

मेरा समंदर

अब नहीं मचते तहलके मन के अंदर 
कुछ शांत हो गया सा लगता है 
पता नहीं कैसे, पर है
तूफानी लहरों की ऊंचाई कुछ कम हो गयी 
कम होती गयी
फिर धीरे चीरे समतल हो गयी
अब कोई हलचल नज़र नहीं आती 
दूर दूर तक 
मेरा वो तूफानी समंदर अब ठहर गया है 
सीधे मैदान जैसा हो गया है 
पानी के रेगिस्तान जैसा 
जिसमे कोई लहर नहीं 
कोई टीला भी नहीं 
कोई घास या पेड़ नहीं

हाँ कभी कभी अभी भी 
हवा का एक झोंका 
कोशिश करता है 
कि मैं कुछ कहूँ 
ऊपर ऊपर से ही सही 
ज़रा उत्तेजित हो जाऊं 
खुश दिखाई दूं 
लहरें बनाऊं 
उछलूँ हवा से खेलूं 
पर कुछ देर की कोशिश के बाद 
हवा थक जाती है 
रुक जाती है 
मेरा रूखापन उसे अच्छा नहीं लगता
वो ठहर जाती है 
पीछे मुड़ जाती है 
मुझे अब इसका बुरा नहीं लगता 
कि उसको बुरा लग रहा है 
हवा तो दुनिया भर में घूमती है 
घूम सकती है 
ढूंढ लेगी कहीं कोई दूसरा समंदर

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...