अब नहीं मचते तहलके मन के अंदर
कुछ शांत हो गया सा लगता है
पता नहीं कैसे, पर है
तूफानी लहरों की ऊंचाई कुछ कम हो गयी
कम होती गयी
फिर धीरे चीरे समतल हो गयी
अब कोई हलचल नज़र नहीं आती
दूर दूर तक
मेरा वो तूफानी समंदर अब ठहर गया है
सीधे मैदान जैसा हो गया है
पानी के रेगिस्तान जैसा
जिसमे कोई लहर नहीं
कोई टीला भी नहीं
कोई घास या पेड़ नहीं
हाँ कभी कभी अभी भी
हवा का एक झोंका
कोशिश करता है
कि मैं कुछ कहूँ
ऊपर ऊपर से ही सही
ज़रा उत्तेजित हो जाऊं
खुश दिखाई दूं
लहरें बनाऊं
उछलूँ हवा से खेलूं
पर कुछ देर की कोशिश के बाद
हवा थक जाती है
रुक जाती है
मेरा रूखापन उसे अच्छा नहीं लगता
वो ठहर जाती है
पीछे मुड़ जाती है
मुझे अब इसका बुरा नहीं लगता
कि उसको बुरा लग रहा है
हवा तो दुनिया भर में घूमती है
घूम सकती है
ढूंढ लेगी कहीं कोई दूसरा समंदर
