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बुधवार, 8 जुलाई 2015

चल अकेला

चले थे अपनी दुनिया का वज़न उठाये हम
ज़िन्दगी भर चलते रहे और ढ़ोते रहे
थक गए थे कंधे, कमर सख़्त हो गयी थी
पर अब उन तक़लीफ़ों का एहसास होता नहीं

परेशानियां हमेशा ही हम पर छाई रहीं
उस छाया में धूप का ज़िक्र तक मुश्किल था
भटकते रहे उम्र भर उजाले की तलाश में
पर अब उन अंधेरों की कालिख भी याद नहीं

एक शर्मसार सा चेहरा तैर जाता है ज़ेहन में
अगर वो तुम ही हो तो कह देना अगली बार
मेरी रूह भी ढूंढती रही है ऐसे ही एक चेहरे को
जिसे मैं भूल गया या नहीं, याद नहीं

आख़िर ज़िन्दगी उस मक़ाम पर आ के ठहर गई
जहां गुलशन का कारोबार रुकता नहीं
अब ना दोस्ती की ज़रुरत 'दोस्त' न दुश्मनी की
अकेले इंसान का कारवां कभी थमता नहीं

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...