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रविवार, 19 जुलाई 2015

न, न, नर्क?

नर्क?
न न, नर्क?
नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता
… अब नहीं जानता तो नहीं जानता
मैं क्या कर सकता हूँ
क्या ये ज़रूरी है कि मुझे जानना चाहिए
सब कुछ?
दुनिया में इतना कुछ है
जो मैं नहीं जानता
उसमें अगर एक और अनजानी चीज़ जुड़ गयी
तो कौन सा नर्क टूट पड़ेगा?

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

हमारी दुनिया

तेरी मेरी दुनिया में ही, होते हैं दिन और रात
पर सूरज को क्या पता कब सुबह हुई कब रात

सुबह सूरज के जग जाने पर, सो जाते हैं सारे तारे,
और उठ जाते हैं फिर से सारे, जब होती है रात

कहीं है दुनिया बेहद गरम, तो कहीं जानलेवा बर्फीली
कहीं हैं उड़ते ग़ुबार रेत के, कहीं रूकती नहीं बरसात

आओ बैठें सुने सुनाएँ अपने किस्से कहानियां
कभी मैं, कभी वो, कभी तुम सुनाओ अपनी बात

खोल के अपने अपने राज़ दिल हल्का कर लो 'दोस्त'
वो कशमकश, शर्मिंदगी, मजबूरी, वो अन्दर की बात

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...