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सोमवार, 6 जुलाई 2015

रास्ता ही काफी है

मैं चल पड़ता हूँ
बस, चल पड़ता हूँ
आदत जो है
चलते रहने की
या यूँ कहो चल पड़ने की

चल पड़ो और बाद में सोचो
कहाँ जाना है
कहाँ जाना सही होगा
रास्ते में कोई ख़तरा तो नहीं

यहाँ छुपे हुए जंगली जानवर
या खूंखार इंसान तो नहीं हैं
कहीं जाना भी है या नहीं
इसमें फायदा होगा या नुक़सान

ये भी नहीं सोचा
रास्ता रास्ता है
रास्ता चलने के लिए है
सोचने के लिए नहीं
दोस्त मज़े करने के लिए हैं
हंसने हंसाने के लिए हैं

नयी बातें सीखने सिखाने के लिए हैं
नए अनुभव बांटने के लिए हैं
दोस्ती निभाने के लिए नहीं
वो सब तो होता रहेगा
जब वक़्त आएगा
दोस्ती अपने आप निभ जाएगी
ये सोचने की ज़रुरत नहीं है
कि जब वैसा होगा
तो मैं ऐसा करूंगा
ऐसा होगा तो शायद वैसा करूंगा


ज़िन्दगी की अपनी लय है
सुर हैताल है
मैं और तुम उसे बदल नहीं सकते
ज़िन्दगी को अपनी ताल पे चलने दो
तुम अपनी लय पकड़ो

घर से निकलो
और चल पड़ो
मंज़िल के बारे में मत सोचो 'दोस्त'
वो आये आये उसकी मर्ज़ी
तुम्हारे पैरों तले रास्ता तो है

बस वही काफी है

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...