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सोमवार, 6 जुलाई 2015

वक़्त की बातें

वक़्त,
वक़्त की क्या बात करें
क्या कहा जा सकता है इसके बारे में
ये दिखाई नहीं देता
सुनाई नहीं देता
चेहरे पर, हाथों में, सीने पर
महसूस नहीं होता
इसकी कोई बू नहीं
कोई हरकत नहीं
अंदर आ जाये तो पता नहीं चलता
चला जाये तो ख़बर नहीं होती
इसका घर-बार नहीं
ठौर-ठिकाना नहीं
अता-पता नहीं
ये ख़ानाबदोश भी तो नहीं

सुना है हर 
इंसान का वक़्त
उसके साथ ही रहता है
पर जनाब लाखों का मेला नज़र आयेगा
मगर उस रेले में उनका साथी, वक़्त
लाख 
ढूंढ़े नज़र नहीं आएगा
बिना देखे-जाने, सोचे-समझे 
लोग बेसाख़्ता कह जाते हैं
वक़्त अच्छा है, बुरा है
मुश्किल है, आसान है
बड़ा वक़्त लग गया !
इतनी जल्दी गुज़र गया?
क्या 
इन्होंने वक़्त को देखा है?
महसूस किया है?
कि वक़्त इनकी उँगलियों में से फिसल गया
या सामने से गुज़र गया
अच्छा ख़ासा चल रहा था
कि एकाएक पलट गया
कमाल है !
हमें तो इसका पता ही नहीं
और 
ये लोग हैं 'दोस्त'
जो हर वक़्त, वक़्त के साथ उलझे रहते हैं



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...